Wednesday, August 13, 2014












प्रतिकूलताएं 
अनुकूलताओं 
की जननी हैं ...!
बाकी सब अपनी 
ही करनी है ...?
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जानवर हैरान हैं 
बढ़ते देख अपना 
नया कुनवा ....!
आदमी की 
शक्ल में ये 
नए जानवर
हैं मनवा....?

=============
गम हो या ख़ुशी 
ये अश्क दोनों में 
अपना एक सा 
रूप दिखाते हैं....!
दोनों अवशरों में 
नमकीन अश्रु लिए
चले आते हैं....!

===============



वो जन-धन तन
को ही अपनी
हैसियत में
मापते थे ....!
क़ाबलियत
और विनम्रता को
कम आंकते थे ...?
बक्त ने जब
पलटा खाया
एक मुश्किल
दौर आया...!
जन-धन -तन
कुछ काम
न आया ....!
तब उन्हें
क़ाबलियत का
ख्याल आया ...!
अब वो ज्ञान पर
जोर देते हैं ...!
योग्यता के आगे
हाथ जोड़ लेते हैं ....!
गुमान का गुब्बारा
हवा में उड़ गया है ....!
"संतोष" अब
वो इंसानियत से
जुड़ गया है....!
==================

लोभ के झोंके.!
मोह के झोंके ...!
यश के झोंके....!
धन के झोंके 
तन के झोंके ....!
जन के झोंके
इन झोंकों में
मन को टोंके.
अहम को रोकें ....!
तू आज की बात कर सारे प्रयास आज पर ही मोड़ दो ...!

कल किसने देखा है कल की बात कल पर ही छोड़ दो....!


बर्तमान जो सुधरेगा कल खुद-ब खुद संवरेगा 'संतोष'


आज की खातिर मुश्किलों की तुम सारी ज़ंजीरें तोड़ दो.....!
उम्र के सर
पर सरापा....!
तन लगा 
कांपा....!
लो आ गया 
बुढ़ापा....?
फादर्स डे पर पिता जी को सादर समर्पित
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मेरे घर की
नीव हैं पिता ...!
मेरे अंदर के
जीव है पिता ....!
मेरे ख्वाबों,
मेरे ख्यालों,
मेरे विचारों,
की तरकीब
हैं पिता ...!
मेरे आदर्शों
मेरे सपनो की
ताबीर हैं पिता...!
मेरे परिवार की
अमूल्य जागीर
हैं पिता ...!
मेरी तकदीर
मेरी तस्वीर
मेरी क़ाबलियत
मेरे हाथों की
लकीर हैं पिता ....!
मेरे दुखों की चिंता,
निराशा में आशा,
मेरी दिलाशा
मेरी खताओं
की माफ़ी
हर मर्ज़
की चावी.
हैं पिता....!
मेरा अस्तित्व
मेरा कृतित्व ..!
मेरी आन
मेरी पहचान
हैं पिता....!
परिवार के
बट बृक्ष ...
हमारी खुशियां
ही थीं जिनका
एक लक्ष्य ....!
हैं पिता....!
क्रूर काल ने
ज़ुदा कर दिया ....!
साया पिता का
हमसे बे बक्त
विदा कर दिया
उनका आशीर्वाद
हमारे साथ है...!
हमारी प्रगति में
उनका ही हाथ है ....!
ईश्वर से बस यही
है.प्रार्थना ...!
हो उनकी पूरी
हर साधना...!
श्री चरणो में
सदा उनका
वास हो....!
'संतोष" उनके
आदर्शों में हमेशा
आस्था और
विस्वास हो ....!
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सफलताओं में


लगते हैं मेले....!


पर संघर्ष


अकेले अकेले...?

शीघ्र इक्क्षित 
फल की चाहत में 
शार्ट कट 
पा लिया....!
कर्मों का कठिन 
रास्ता छोड़
इबादत का
सुलभ रास्ता
अपना लिया...!
कर्मों को बड़ी
बेरहमी से
दफना दिया....!

Saturday, May 10, 2014


चुनावी
घमासान में
नेताओं के
सींघ निकल
आये हैं...!
बे-बजह
मुद्दों को छोड़
हवा में लड़ने को
उतर आये हैं....?
एक दूसरे पर
भद्दी छींटा-कशी
अब आम हो गई है....!
बाज भी आओ
चुनावी शाम हो गई है....!
कल की सुबह
नया सबेरा लेकर
आएगी ....!
ये रोज रोज की
तू-तू में-में "संतोष"
यही धरी रह जाएगी...?
मन के दो पहलु
सुख और दुःख...!
मन प्रसन्न ,,,सुख ....!
मन खिन्न....दुःख....!
"संतोष' यंहा हर शख्स को नफरत झूठ से है,
मैँ परेशा हूँ कि फिर ये झूठ बोलता कौन है...?
आजकल
सबसे बड़ा
उद्योग
राजनीति है ...!
कम लागत में
दिखती
बृहद लाभ की
परिणीति है ....?
आजकल
घर अब
मकान
हो गये हैं ....!
रिश्ते -नाते
ब्यवसायिक
दुकान
हो गये हैं....?
सरकारी
लगाम अब
नाकाम
हो रही है ..?
तभी तो
नेताओं की
जुवान अब
बे-लगाम
हो रही है....?
"माचिस की
ज़रूरत यहाँ
नहीं पड़ती...
यहाँ आदमी
आदमी से
जलता है...!!"
'सब्र' और 'सच्चाई' एक ऐसी सवारी है"संतोष"...
जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती.....
ना किसी के कदमो में. और
ना किसी की नज़रों में..........?
हमारा दुश्मन हमसे बोला "बहुत महंगी पड़ेगी तुझे दुश्मनी मेरी"संतोष"
हमने उसको उत्तर ये दिया कि "सस्ती चीज हम कभी खरीदते ही नहीं"

आदमी का
गिरता स्तर
जल स्तर
से भी नीचे
जा रहा है....!
आँखों में अब
जल संकट
साफ नज़र
आ रहा है....
आँखों की नमी
कंही खो गई है...!
पथरानी आँखे
अब सो गई हैं...?
पानी की कमी
का असर
जज़बातों पर
दिखता है ..
ज़ज़्बात भी
हालात पर
बिकता है....?
कितने बादल
गरजे होंगे...?
कितने बादल
बरसे होंगे...?
आंधी- तूफां,
बिजली गगन में
जब चमकी होगी ...!
तब काली बदरी
मेघ बन बरसी होगी...!
यूँ ही आसानी से
पानी कभी न
मिल पाता है....!
बिन पानी ही
पानी का मोल
समझ आता है...!
पानी ब्यर्थ न
गंवाएं ..!
जल ही जीवन है
इसे बचाएं....!
अब तो जल के
ठाठ निराले
ए टी एम से
पानी निकाले,,,!
"संतोष" पानी
का मान
करें हम
बक्त आने पर
पानी का दान
करें हम ....!

इंसानी
संवेदना
न जाने कंहा
खोती जा रही है ...?
पर जानवरों में
मानवीय
संवेदना
आ रही है...?
क्या हम
जानवरों से
पीछे होते
जा रहे हैं....!
इंसान की छवि
खोते जा रहे हैं....?
बात बात पर
सिर्फ मुह
चलाते हैं ...
हासिल कुछ
नहीं कर पाते हैं.... ?
जानवर हाथ -पैर
चला मेहनत की
खाते हैं...!
हम मुफ़्त खाने की
लत लगाते हैं ....?
आदमी
आदमियत से
पीछे भागते हैं...
"संतोष"तभी तो
जानवर भी
आदमियत से
डर जाते हैं...!

बिना सोचे समझे
कुछ भी बोलते हैं....!
बोलने के पूर्व न
तोलते हैं.
बे-बजह अपना
मुह खोलते हैं....!
फिर अपनी
वाणी से मुह
मोड़ते हैं....?
ये आजकल
आम हो गया है...!
आदमी रंग
बदलने में
बदनाम हो गया है....!
रंग बदलने में
गिरगिट भी
अब लजाती है....!
आज के आदमी से
मात खाती है....?
अब तो योगी संत
सब झूठ के
सहारे खड़े हैं....?
"संतोष" तभी तो
वो हम आप से
बेहद बड़े हैं...?
खतरों के खिलाडी
-----------------------
खतरों के
नाम पर
न जाने
क्या क्या
कराते हैं....!
कीड़े मकूड़े
मुह के ऊपर
डालते हुए
दिखाते हैं....!
हर नयी
कड़ी में नया
खतरा बढ़ाते हैं....!
दर्शकों को
इसी तरह
उलझाते हैं....!
अमानवीय खतरे
दिखाना क्या
लाज़िमी है....?
ये खतरों की अंधी
प्रतियोगिताएँ
आज भी हैं....!
"संतोष" पैसों की
खातिर न जाने
क्या क्या
कर जाते हैं....!
और खतरों के
खिलाडी
बन जाते हैं....!

फेसबुक में चेहरे
मुखौटों की तरह
बदलते हैं....!
कुछ तो चेहरों
को देख
मचलते हैं....?
असली नकली
की पहचान यंहा
मुश्किल है ....!
यंहा सम्हालना
सिर्फ अपना
दिल है....!
जो नकली चेहरों
की गिरफ्त में
आ जाते हैं....!
फिर वो जीवन भर
पछिताते हैं...?
कुछ तो समय
बिताने आते है....!
कुछ मौज उड़ाने
आते हैं....!
कुछ तो इसके
शिकार हो जाते हैं....!
इसके चक्कर में
बेकार हो जाते हैं....!
फिर भी संवाद
सम्प्रेषण का
सुलभ साधन है....!
विचारों की
अभिब्यक्ति का
सुगम माध्यम है....!
यंहा सोच-समझ कर
दोस्ती करिये....!
अनजान चेहरों से
सम्हलिये.....!
नई जानकारी
नए नए रूप में
यंहा मिलती है....!
एक दूसरे के
माध्यम से तेजी से
फल-फूलती है....!
फेसबुक का सही
प्रयोग ज्ञान
वर्धक है.....!
"संतोष" अन्यथा
ये निर्थक है....?

सच जब भी सामने आता है
झूठ जब दबंगई दिखाता है .........बुरा लगता है....!

महफिलें रास नहीं आती हैं
तन्हाई जब पास बुलाती हैं .... ....बुरा लगता है.....!

पहाड़ तले जब ऊंट आता है ..
अपनों का साथ छूट जाता है .......बुरा लगता है.....!

ग़मों की झड़ी लग जाती है ...
वफायें जब हमें ठग जाती हैं .......बुरा लगता है.....!

आईना जब सामने आता है.
फरेबी चेहरा सामने लाता है ......बुरा लगता है.....!

फ़र्ज़ जब निभाया जाता है ...
क़र्ज़ जब चुकाया जाता है ........ बुरा लगता है.....!

मेह्गाई के इस मौजूं दौर में
परिवार जब चलाया जाता है .... बुरा लगता है.....! .

अनैतिकता से कमाया जाता है
कालाधन जब छिपाया जाता है.... बुरा लगता है.....!

सत्ता जनहित जब नकारती है ...
"संतोष" माँ भारती कराहती है.... बुरा लगता है.....!

Thursday, April 10, 2014

मुसीबतों में ही इंसान की पहचान होती है....!
ग़मों के साये में ही आस्था जवान होती है...!

बे-शक रहें अपने अपने यक़ीनो के साथ
इन यक़ीनों से ही खुदाई महान होती है....!

यूँ तो बुरे-बक्त में, मंजूर है हमें हर मशविरा,
जुवां चुप है मुसीबत आँखों से बयान होती है....!

वफ़ा के बंधनों के नाम, ज़माने में बहुत हैं मगर
रिश्ते-नाते,दोस्ती की,बक्त से पहचान होती है...!

दौरे मुसीबत में, हर दर पै सज़दे करते हैं लोग,
उसी के नूर से ही रूहानी चाहत जवान होती है....!

दिलों पर काबिज़ हो जाती हैं ये तंग तन्हाईयाँ,
जब भी मुश्किलों में उलझी, हमारी जान होती है....!

"संतोष"दर्द दिल का किस किस को सुनाएंगे हम
सब्र रखना मुनासिब है,हौसलों में ही जान होती है ....!

Wednesday, April 9, 2014

मंदिर मस्ज़िद और गुरुद्वारों में...
चर्च तथा तीर्थों के गलियारों में ...!
बहुत खोजा पर सतोष न मिला....

रहीसों और नेताओं की बस्ती में,
पूंजी-पतियों की अनंत मस्ती में
बहुत खोजा पर संतोष न मिला......

यज्ञों की पावन अग्नि ज्वालाओं में
मन के फेर की मन मालाओं में ..
बहुत खोजा पर संतोष न मिला.....

गंगा-यमुना के हर पावन तट में....
काशी जैसे शमशानों के मरघट में ..
बहुत खोजा पर संतोष न मिला.......!

चारों धाम की मंगल तीर्थ यात्राओं में...
गीता,वेद-पुराण और धर्म-शाश्त्रो में
बहुत खोजा पर संतोष न मिला.......!

बाबा-बैरागियों की धर्म की खोली में
बे-बस, मजबूर की याचक झोली में ...!
बहुत खोजा पर संतोष न मिला .....

मात-पिता के पावन हरि से चरणो में
मन-मंदिर के अंदर बहते झरनों में
जब दिल से खोजा तब "संतोष" मिला...!
अब बड़ा सचेत है
ये आम आदमी...!
देखने में सहज
पर बड़ा तेज है
ये आम आदमी...!
करता किसी से
नहीं परहेज है
ये आम आदमी...!
कोई देता है जब
इसे झूठा झांसा
देता है वोट का
क़ानूनी तमाचा
ये आम आदमी...!
भूख-गरीबी,बेकारी 
महगाई से त्रस्त है
ये आम आदमी ...!
भ्रस्ट-ब्यवस्था
नेता-गिरी से पस्त है
ये आम आदमी...!
पेट की आग को
बुझाने में ब्यस्त है
ये आम आदमी...!
अपनी ही समस्याओं
से बड़ा ग्रस्त है
ये आम आदमी....!
पांच वर्षों में मिलता है
"संतोष"इसे मौका
तभी अपना हक़
जताने में मस्त है
ये आम आदमी...! 

Thursday, April 3, 2014

गर ज़िंदा हैं तो ज़िंदा होने का कुछ तो सबूत दीजिये ....!
सरे राह तड़पती मानवता पर, कुछ तो हुज़ूर कीजिये ...!
मरती संवेदनाओं को, जरा कुछ तो जीवंत कीजिये...!
नव-बालाओं,अबलाओं को समाज में बलवंत कीजिये
गर भ्रस्टाचार रोक न सकें,पर भ्रस्टाचार न कीजिये...?
सदाचार न सही न करें, पर कदाचार तो न कीजिये.. !
वोट की खातिर नेताओ, प्रजातंत्र पर प्रहार न कीजिये...!
अमन-चैन की बस्ती में, जाति-धर्म का वार न कीजिये...?
इंसानियत की राह में, इंसानियत से इंकार न कीजिये...!
कायम रहे भाईचारा,बे-बजह आपसी तकरार न कीजिये...!
रखें अपनी ख्वाहिशेों पर काबू,इक्छायें बे-शुमार न कीजिये...!
धन-दौलत की अंधी दौड़ में, गैर-बाजिब ब्यापार न कीजिये....!
"संतोष" ज़माने में हर शक्श पर, यूँ ही ऐतवार न कीजिये...!
लगे हैं यंहा चेहरे पै चेहरे,हर किसी को गम-ख्वार न कीजिये...?

Wednesday, April 2, 2014


माना कि मंज़िले मुझसे दूर हैं दूर सही
रास्तों से कह दो अभी रुका नहीं हूँ में ..!

दुश्मनी का शौक हैं तो सब्र भी रखो,
अभी बक्त के थपेड़ों से टूटा नहीं हूँ में...!

राहे-मंज़िल में मेरी,खार बिछाने वालो,
फूल क्या.,काँटों से दोस्ती रखता हूँ में ...!

मेरी खामोशियाँ,अफ़साने बयां करती हैं
तरानों से हर दिलों में बसा करता हूँ में ...!

साथ चलता है मेरे दुआओं का काफिला
मुसीबतों से कह दो अभी डरा नहीं हूँ में....!

"संतोष"नाम है सब्र का,शुकून का तस्सली का
तभी तो ज़िंदगी के हर रंगों में रंगा हुआ हूँ में...!
सत्ता की चाह में
नेता नियंत्रण
खोते जा रहे हैं...!
फिसलती जुवान
से स्तरहीन
होते जा रहे हैं...!
शेर से चूहे,कुत्ते
बिल्ली तक
आ गये हैं...!
गालियों की क्या कहें...?
एक दूसरे को
नोचे खा रहे हैं...?
ये सत्ता रानी
न जाने किसका
वरण करेगी...?
"संतोष"ये नेता-गिरी
कब तक नैतिकता का
हरण करेगी...?
जबलपुर में
हर वर्ष बढ़ते हैं...!
राजनेतिक दल
दिखावे का
आंदोलन भी
करते हैं...?
पर दाम क्या कभी
आगे बढ़ने के बाद
पीछे हटते हैं...?
ये तो पार्टियां हैं
जो दामों में लगी
आग से अपनी
रोटियां सेंकते हैं...!
और ये दूध वाले
दूधिये बल्ब की
तरह चमकते हैं...!
गाय-भैसों का
चारा जब ये
नेता खा जायेंगे...!
फिर तो ये भूखे
ही रह जायेंगे...!
जानवरों का
निवाला
तो न छीने...!
"संतोष" बच्चों से
दूध का प्याला
तो न छीने...?
सरकारी नियंत्रण
अब सुस्त हो रहा है...!
तभी तो हर कोई
अब मस्त हो रहा है...?
मेहनशकश
मेहनत कर
मर रहा है...!
पूंजीपति
बिना मेहनत
अपनी जेब
भर रहा है...!
मज़दूर अपने
हक़ के लिए
लड़ रहा है...!
मालिक
खुलेआम
शोषण
कर रहा है...!
ये हमारी
आज़ादी का
दर्पण है...!
जंहा श्रमिकों का
सिर्फ तर्पण है...?
बेकारी,भूख
और गरीबी...!
आज़ाद भारत
में अभी भी...?
भारत माँ भी
अब अपनी
सरकारों से
परेशान है...!
क्यूँ कि "संतोष"
सरकारें मौलिक
मुद्दों से बनी
अनजान हैं...?

वैसे तो बारह महीने
हम एक दूसरे को
मुर्ख बना रहे है...?
फिर भी आज
1 अप्रैल को
हम मुर्ख दिवस
मना रहे हैं...?
मुर्ख दिवस मनाने
का अपना एक
अंदाज़ है ..!
यंहा तो हर कोई
मुर्ख बनाने में
सरताज है...?
चपरासी बाबू को
बाबू साहिब को
साहिब बड़े साहिब को
बड़े साहिब बॉस को
नेता जनता को
और जनता
अपने आप को
मुर्ख बना रही है ...!
तभी तो जनता
की लगाम इन
नेताओं के हाथ में
आ रही है...?
हमको जाति-धर्म
के नाम पर बाँट कर
ये वोट मांगते हैं ...?
भावनाओं को
भड़काना
ये बखूबी जानते हैं...?
आइये अब हम
इनको भी
मुर्ख बनायें ...!
अनेकता में एकता
और भाईचारे का
रंग इनको दिखाएँ ...!
हमें बाँटने वालों को
हम ऐसा छकाये....!
दुबारा हमारे घर
'संतोष" वोट मांगने
कभी न आयें....?

अद्वतीय,अनमोल,अतुल्य,
अविस्मरणीय है माँ
साक्षात् ममता की मूरत,
रमणी से भी रमणीय है माँ
अविनाशी,घट-घट वासी,
सब की संकट हारणी है माँ
भक्तों की सदा करती रक्षा,
छत्र,त्रिशूल धारिणी है माँ ...!
चरणो में जो भी माँ के आता ,
उसके लिए तो दयनीय है माँ ...!
कामना हमारी करती पूरी
हमारे लिए कमनीय है माँ ....!
अन्तर्वासी,अंतर्यामी,अभय दायनी,
बिन मांगे बर देती, बरदायनी है माँ
अंधेरों में तू राह दिखाती,भ्रम हटाती
भक्तों की कल्याण कारिणी है माँ ...!
"संतोष" पड़ा माँ शरण में तेरी
अब अपने अंक उठा ले माँ ....!
ये दुनिया मुझको रास न आवे
अब अपने दरश दिखा दे माँ....!

फूल खिलने के बाद बिखर जाते हैं ...!
पर कांटे अपना असर छोड़ जाते हैं...!

दौलत मिलने के बाद हम संवर जाते हैं ...?
पर सामने आते ही आइना बिफर जाते हैं ...!

बड़ी अजीब रश्मे है इस दुनिया की...!
मुश्किलें दौरां में हम ठहर जाते हैं ...?

झूठ में जीने की आदत हो गई है हमें
सच सामने आते ही हम सिहर जाते हैं ...!

बच्चों को इंसान बनाने की फ़िक्र में
हम खुद इंसानियत से दूर चले जाते हैं ....?

बंदे खुदा के बनके आये थे "संतोष'इस जंहा में
अपनी जरूरतों में खोकर हम बेखबर हो जाते हैं...!

कलियुग में फर्क नहीं है, साधू और शैतान का
बाबाओं ने नाम डुबाया, रहीम और राम का ...?

इंसानियत ही पहला धर्मं है इंसान का...
फिर पन्ना खुलता है गीता या कुरान का...

पर आदमी है यंहा राम का या रहमान का
भला तो वो पंक्षी है, जो है सारे जहान का ...?

दौलत की अंधी गली ही सबको प्यारी लागे
नेकी उनको रास न आवे,काम करें हैवान का...?

दी कुदरत ने है जब, एक सी नेमत हमको
प्रेम के ढाई आखर से,जीते दिल जहान का ...?

दिखाएँ दरिया दिली,मिटा दें गर में को हम अपने
बंदा खुद बन जायेगा खुदा,नाम होगा भगवान का ...!

जंहा में ज़िंदगी ज़मी की है "संतोष"दो पल की
फिर अनजान अनंत सफ़र है चिर आसमान का...!
" दुनिया से मिलने मे सब मस्त है "संतोष'
और खुद से मिलने की सारी लाइने व्यस्त है...!!! "
कैद कर दिया सापों को ये कहकर सपेरे ने "संतोष'
बस अब ईन्सानो को डसने के लिये ईन्सान काफी है "...
रंगो का ये त्यौहार
लाये खुशियां अपार
करे प्यार की बौछार
बजे दिलों में झंकार ...!
छाये रंगो का श्रृंगार ....!
गिरे नफरतों की दीवार
हर तरफ हो प्रेम की बहार ...!
अच्छाई की जय-जय कार ...!
"संतोष"आप को मुबारक हो
प्रीति का ये होली त्यौहार...!

नेताओ की होली ..
एक दूजे पर कीचड़ उछाल खेलें नेता जी होली ...!
गज़ब की इनकी भाषा है और गज़ब की बोली ...!

कुर्सी का रंग ही याद रहा बाकी रंग सब भूले...!
सत-रंगी दुनिया छोड़ चुनावी रंग में ही फूले...!

झूठे वादे-प्रेम दिखावे अब पहुँच रहे हैं घर घर...!
सत्ता की लालसा में,बिन खेले हो गए तर-तर ...!

महगाई के काले रंग में, अब फीकी होली होती..!
किसी ने नेता जी पर महगाई की कालिख पोती...?

कब तलक खेलेंगे ये, जन-भावनाओं की होली....!
सजगता से सोच के, भरना अब वोट की झोली...!

'संतोष' अब बाज़ार में ,नेताओं की किश्म बहुत हैं...!
दुष्कर हुई है परख, राजनीति में तिलिस्म बहुत हैं...?

होली की हुड दंग में,मन में ये कैसी उमंग ...!
डोर तोड़ वो उड़ गया,लो ऐसी जागी तरंग ...!

बिन पिए ही मदहोश हैं,सब बन रहे दबंग...!
मुन्नी को बदनाम करें,शीला हो गई तंग....!

शीला हो गई तंग, देवन लागी है गारी...!
बुरा न माने कोनो भाई, ये तो है हुरियारी...?

गुलाल-अबीर के भैया, अब दिन गए हैं बिसारी...
एक-दूजे पर कीचड़ फेकें, ऐसी गई मति मारी...?

बच्चे-बूढ़े समझ न आवें,पहचान न पावें नारी...!
ऐसे रंग में रंगे हर कोई,नाचत दुनिया सारी...!

राधा संग नाचे हैं मोहन,झूमत नर और नारी...!
हम बनें दुःख में सहभागी,ये परंपरा है हमारी...!

होली के त्यौहार पर, त्यागें द्वेष,दुश्मनी,और गँवारी ...!
"संतोष" सब मिलें प्रेम से, बनाये पर्व की गरिमा प्यारी...!
ज्यादा लालच इंसान को नेता बना देता है...!
बंगाल से दिल्ली में ला खड़ा कर देता है..
दूसरों के बल पर कभी राजनीती नहीं होती...!
अपनी क़ाबलियत औरों से छिपी नहीं होती...!
सोचा था साम्राज्य का विस्तार करेंगे ...?
अब अन्ना के भरोसे नैया पार करेंगे ...!
देल्ही की जनता को ममता से मोह नहीं है ...!
और ममता के मोह का कोई छोर नहीं है..!
राजनीती किस करवट बैठ जाये ...?
आज तक कोई न इसे समझ पाये ...?
"संतोष"वक़्त नूर को बेनूर बना देता है!
छोटे से जख्म को नासूर बना देता है!
अरे भाई माओ...!
दिल से दिल
मिलाओ ...?
जरा कुछ तो
संवेदना दिखाओ...!
अपने मलाल को
खुल के तो
बताओ....!
बहुत हो चुकी हिंसा
अब तो अमन के
रास्ते आओ...!
बातचीत से हर
समस्या का हल है...!
ये न भूलो
देखा किसने कल है...?
खूबसूरत प्रकृति की
छटा में यूँ न नफरत
बरसाओ...?
नैसर्गिक प्रेम की
धरा पर"संतोष" कुछ
तो प्यार फैलाओ..!
कोई मलाल में रहता है...!
कोई जलाल में रहता है...!

समस्याएं बढ़ी हैं इस कदर
हर शख्स जंजाल में रहता है ...!

उलझनो में उलझा हुआ है
गुम -सुम वो ख्याल में रहता है...!

फ़िक्र है उसे अपने आशियाने की,
तभी वो दुनियाई बबाल में रहता है...!

गरीब अब पेट की आग बुझाये कैसे
दौरे-महगाई में इस सवाल में रहता है...!

मज़दूर अपने जायज हक़ से बंचित है
तभी तो वो अब हड़ताल में रहता है...!

खुशियों को न जाने किसकी नज़र लगी...?
इसीलिए "संतोष" अब पड़ताल में रहता है ...?

दिल में उमंग ,मन में तरंग हो तो होती है होली ..!
अपनों का संग,हाथों में हो रंग तो होती है होली...!

रंग हो प्रीति का, या हो मीत का तो होती है होली...!
रंग हो हार का,या हो जीत का तो होती है होली...!

रंग हो विस्वास का, अपनों की आस का होती है होली..
रंग हो अहसास का, और पास-पास का होती है होली...!

रंग हो मस्ती का, प्रेम की बस्ती का, तो होती है होली...!
दंभों की धुलाई, दुश्मनी की सफाई हो तो होती है होली...?

रंग में न भंग हो, भंग भले ही संग हो तो होती है होली..!
भीगे हर अंग हों, हाथों में बहु-रंग हों तो होती है होली...!

अबीर-गुलाल पिचकारी अंखियन हरियारी हो होती है होली ...!
गांव की गौरी शहर की छोरी हैं सब मतवारी होती है होली...!

फाल्गुनी गीतों की बहार,रंगों की फुहार हो तो होती है होली ...!
"संतोष" डूबे जो उल्हास में, राधा कृष्ण के रास में होती है होली..!

Sunday, February 23, 2014

किसी को कंहा है खुद की खबर
कैसा होगा ये ज़िंदगी का सफ़र..?

हर मोड़ पर नई है ज़िंदगी की डगर ...!
हादसों से सबक हमने सीखा मगर ....!

अपने- बेगाने,बेगाने -अपने बनते रहे .
हम रखते हैं अपनी, मंज़िल पर नज़र ...!

हमारी चाहत मे डूबे  हैं वो इस तरह
खुद को भूले न रही ज़माने की खबर ....!

नफरत के चिरागों से रौशनी मुमकिन नहीं,
रौशनी मुहब्बत की देती है,रोशन सा घर ..!

हर रंगो से रंगी हुई है ये नवरंग ज़िंदगी,
कोई रंगो में लिपटा,तो कोई है बे-असर  ...?

"संतोष"ज़िंदगी के फलसफे ज़ुदा ज़ुदा ही सही
पर इश्क ज़िंदगी से किसी का नहीं है कमतर ..?

Wednesday, February 19, 2014

अँधेरे से जिनकी हो गई है यारी 

उजाले उन्ही से जले जा रहे हैं ...?


नफरतों के साये में जो बस रहे हैं 

तराने वफ़ा के अब वही गा रहे हैं...!



हज़ारों दाग लगे हैं दामन पर जिनके

वही अब नेकी बयां किये जा रहे हैं ...!


तमन्नाओं की कश्ती डूबी इस जंहा में,

अरमान फिर भी जंहा से रखे जा रहे हैं ...!


हर शक्श सहमा सा बुझता सा दिखता,

मॅहगाई के तलवे में, सारे दबे जा रहे है,,,!


ब्यवसाय बनी है अब यंहा राजनीति ...

आम-जन इन्ही से, अब ठगे जा रहे हैं ....!


कंही महलों की महकती, खुशबु है बिखरी

कंही गर्दिशे -गम में, वो बिखरे जा रहे हैं...


खुशियों के दामन से कुछ सिमटे हैं बैठे

"संतोष" हम गम से ही निखरे जा रहे हैं ....!
आदमी के अंदर 

भी हैं कई आदमी ...!


पर आदमियत से 


मरहूम है हर आदमी..?
सपनो का सौदागर
 
मुंगेरीलाल 

साबित हुआ...?


दिल्ली को सपने 


दिखा के खुद 


खोदा कुंआ ...?

Thursday, February 13, 2014

मैंने कल
चाहतों की
सब किताबें
फाड़ दी;
सिर्फ एक
कागज़ पर
लफ्जे माँ
रहने दिया है
क्यूँ की
दुनिया में
'संतोष' माँ
ने ही चाहत
"लफ्ज"
दुनिया को
दिया है ....?
प्यार का प्रथम
इज़हार माँ को
समर्पित है...!
क्यूँ कि पहला
प्यार माँ
द्वारा ही
दुनिया को
अर्पित है....!
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शुभ वेलेंटाइन डे 

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सांसदों में गर
पानी होता ...?
तो सांसद
मर्यादा
न खोता....?
संसद
पानी पानी
न होती....?
गरिमा भी
सकुचानी
न होती....?
संसद की
मर्यादा
भंग हुई ....?
क्यूँ अब
मानसिकता
इतनी तंग हुई ....?

Thursday, February 6, 2014

प्रेम का
मधुर
राग.
अनुराग ...!
प्रेम की
गहन
अभिब्यक्ति...
अनुरक्ति ....!
माँ नर्मदा की पावन जयंती पर नर्मदा जी के चरणों में सादर समर्पित..

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नर्मदा की पावन जलधार...!
करती हम सबका बेड़ापार ...!

जिनके दर्शन में चमत्कार ...!
दर्शन से ही करती जो उद्धार ...!

माघ शुक्ल सप्तमी का अवतार ...
हर कंकड़ शंकर है शिवाकार ...!

अमरकंटक से लेती हैं आकार...!
रत्नासागर में समाहित जलधार ..!

पाप हरण कर करती कल्याण ..!
हम सब करते उनका गुण-गान...!

अज़र अमर का जिनको वरदान ..!
प्रदक्षिणा जिनकी है सदा महान ....!

जिनका तट है सुर्भीक्ष समान ...!
"संतोष" पड़ा तेरी शरण में आन ...!

नमामि जय जय माँ देवी नर्मदे ...!
हम भक्तों के भय,चिंता सब हर दे ...!
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संतोष कुमार नेमा "संतोष"
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Monday, February 3, 2014

ऋतू बसंत की
फ़िज़ां आ गयी है ...!
तन-मन पर
बासन्ती घटा
छा गयी है .
भोरों में अब भी
सनक वही है ...!
पर कलियों में वो
मेहक नहीं है
बाग-बगीचे
बौरा गए हैं ...!
गुलशन में अब
भौरां नए हैं...!
कोयल भी अब
मधुर गीत
है गाये ..!
पीली सरसों
अम्बर पर छाये...!
नव-उमंग
नव-तरंग
है लाया ....!
मन-मोहक
मधुर बसंत
है आया...!
तितलियाँ
इठलाके
नाच रही हैं...!
बच्चे-बूढ़े
सब के मन को
जाँच रही हैं...?
वीणा वादिनी
हम को ऐसे
स्वर दें ....!
जन-जन में
हम नवरंग
भर दें ....!
"संतोष" ऋतू
बसंत की मस्ती में
मदहोश हुआ है...!
फिर भी देखो
असंतोष हुआ है ...?
पहले आदमी
की सही
पहिचान
उसके
आचार-विचार
ब्यवहार
हुआ करते थे ...!
अब जन -धन
कदाचार
हुआ करते हैं...!
सदाचार के
ठेकेदार
अब ज़ैल में
घूमा करते हैं ...?
कलम और तलवार
किसकी है तेज धार...?

कौन करता चौतरफा वार ...?
किससे से डरती है सरकार...?

कलम के आगे सब लाचार ..?
कलम कराती हा हा कार ...!

कलम निकलवाती है तलवार...?
कलम ही बहाती शांति बयार ....!

कलम रखती सामाजिक सरोकार ...!
कलम के बिना सूना है सब संसार ...!

कलम की ताकत है अपार .!
कलम फैलाती प्यार ही प्यार ...!

कलम है दुहरी दो धारी तलवार ..
शांति और क्रांति दोनों पर सवार ..!

तलवार बढ़ाती भय और अत्याचार ...!
कलम सिखाती, सामाजिक संस्कार ...!

'संतोष' कलम है जीवन आधार ...!
कलम की लाठी करती अंधी मार ...!

Wednesday, January 29, 2014

दिल और दिमाग की ज़ंग 

दोनों आपस में
बुरी तरह 
झगड़ रहे थे 
किसी मुद्दे पर
तर्क-कुतर्क
कर रहे थे ...!
दिमाग दिल पर
हावी था ...!
क्यूँ की सवाल
जजबाती था ...!
दिल अपना
मिज़ाज़ बदलने
न राजी था ...!
दिमाग बोला
तुम अपना
रिवाज़ बदलो ...!
दिल ने कहा
तुम अपना
अंदाज़ बदलो...!
हर बक्त
नफा-नुकशान का
हिसाब लगाते हो...!
इंसानी रिश्तों को
सदा झुठलाते हो...?
दिमाग झट तनाव
में आया ...!
जोर से ऊँचे स्वर में
चिल्लाया ....!
हर बक्त भावनाओं,
संवेदनाओं से
घिरे रहते हो...!
धोखा खाते ही,
मुझे दोष देते हो...!
कुछ तो मेरा भी
इस्तेमाल करो....!
और मुझे भी
साथ लेकर चलो...!
दिल को दिमाग का
ये सुझाव रास आया ....!
फिर दोनों
मुस्कराये....!
ख़ुशी से
हाथ मिलाये ...!
अब हम आपसी
समझ-सामंजस्य
से काम लेंगे ...!
तभी "संतोष"
फैसलों को
अंज़ाम देंगें ....?
पैसा और सिद्धांत 

दोनों एक साथ 


नहीं चलते...!


तभी तो दोनों 


के कुंडली 


मिलान नहीं 


मिलते....?


जीवन आधार


जंहा पैसा है ...

वंहा सिद्धांत


कैसा है...?
जंहा सिद्धांत 


टिका है ...!
वंहा पैसा 


डिगा है....!
हर बक्त नाकाम होंगी खुसबू को कैद करने की कोशिशें ...!

"संतोष" रौशनी की एक किरण अँधेरे को चीर जाती है...!

निंदा रस

सहज सरस...!


जिसके आगे 


सब बे-बस...!

Tuesday, January 28, 2014

ख़ुशी की तलाश में हम 
गम के करीब हो गए...!

ख़ुशी के रास्ते भी अब 
कितने अज़ीब हो गए ...!

झूठ की सवारी कर हम
अब खुशनसीब हो गए...?

कैसी हैं बक्त की मजबूरियां ...?
जो हबीब थे,वो रक़ीब हो गए....!

सच का सामना दो पल न कर सकें,
हम अब इतने, बद-नसीब हो गए ...!

ज़माने के साथ चलते चलते "संतोष"
झूठ-फरेब के कितने करीब हो गए ..?
दिल और दिमाग की ज़ंग 

दोनों आपस में
बुरी तरह 
झगड़ रहे थे 
किसी मुद्दे पर
तर्क-कुतर्क
कर रहे थे ...!
दिमाग दिल पर
हावी था ...!
क्यूँ की सवाल
जजबाती था ...!
दिल अपना
मिज़ाज़ बदलने
न राजी था ...!
दिमाग बोला
तुम अपना
रिवाज़ बदलो ...!
दिल ने कहा
तुम अपना
अंदाज़ बदलो...!
हर बक्त
नफा-नुकशान का
हिसाब लगाते हो...!
इंसानी रिश्तों को
सदा झुठलाते हो...?
दिमाग झट तनाव
में आया ...!
जोर से ऊँचे स्वर में
चिल्लाया ....!
हर बक्त भावनाओं,
संवेदनाओं से
घिरे रहते हो...!
धोखा खाते ही,
मुझे दोष देते हो...!
कुछ तो मेरा भी
इस्तेमाल करो....!
और मुझे भी
साथ लेकर चलो...!
दिल को दिमाग का
ये सुझाव रास आया ....!
फिर दोनों
मुस्कराये....!
ख़ुशी से
हाथ मिलाये ...!
अब हम आपसी
समझ-सामंजस्य
से काम लेंगे ...!
तभी "संतोष"
फैसलों को
अंज़ाम देंगें ....?

Monday, January 27, 2014

में जब भी लिखता हूँ दिले-गुबार लिखता हूँ...!
खिज़ां के मौसम में, फसले -बहार लिखता हूँ ...!
नफरतों की बस्ती में, प्यार ही प्यार लिखता हूँ...!
वो गम दें या ख़ुशी, में गमख्वार लिखता हूँ ...!
धनवानों के धन की, में बढ़ती रफ़्तार लिखता हूँ ...
मुफलिसी की नाव की,फिसलती पतवार लिखता हूँ ....!
मेहनत कश आवाम की, जय जय कार लिखता हूँ....!
जुमले जालिमों के जुल्म के , में सौ बार लिखता हुँ....!
भ्रस्ट ब्यवस्था उजागर करने , भ्रस्टाचार लिखता हूँ ...!
शोषण और अन्याय के खिलाफ, इंक़लाब लिखता हूँ...!
जन-जन की हर पीड़ा को, में बे-हिसाब लिखता हूँ...
भूख,गरीबी,बेकारी पर,सत्ता की हरयाली पर दो टूक लिखता हूँ....!
मेहगाई की मार से मरते,नंगे-भूखे इंसानों की भूख लिखता हूँ .....!
पाक की नापाकगी पर,आतंकी करतूतों पर बे-खौफ लिखता हूँ...!
बेतहासा बढ़ती नेताओं की धन-दौलत को, सरकारी मौज लिखता हूँ ...?
गम की स्याह रातों में, रौशनी की बयार लिखता हूँ...
आम आदमी के दर्द को "संतोष' हज़ार बार लिखता हूँ ....!
युवाओ ...
आपका.....
जोशो-जूनून
रंग तो ..
लाता है....!
पर अनुभव
हीनता से ,
बद -रंग
हो जाता है...?
अनुभव का,
जोशो-जूनून से,
गहरा नाता है...!
जब भी इनके
साथ आता है...
रंगों में भी,
रंग भर जाता है....!
ये पंचायतें भी,
गज़ब ढा रही हैं....!
प्यार की सजा
गेंग-रेप से
दिला रही हैं...?
क्या..?
पंचायती राज्य
का ये ही
पैगाम है...?
लोकतंत्र में,
इंसानियत का
कत्ले-आम है...?
अब इनके
फैसलों पर भी
इन्ही के हिमायती
चाहते लगाम हैं...!
पंचायतों के
बे-तरकीब
फैसले जबरन
सरअंजाम हैं....!
'संतोष'अब
सरकारी मूकता.भी...
सरेआम है....?
काँटों के बीच
जीभ एक
नाज़ुक सी
कली...?
जीभ की
फितरत
अच्छी या भली....!
ये तो इसके
प्रयोग पर टली...!
"संतोष"जीभ जब
भी चली ...!
कंही राहत
तो कंही
आफत बढ़ी ...!

Thursday, January 23, 2014

लोग बे-मौत
मर रहे हैं...!
सर्दी से
ठुठर रहे हैं ...!
भूख से
कराह रहे हैं....!
बीमार बूढ़े-बच्चे,
दवा चाह रहे हैं ....!
माँ-बहिने
आशंकित हैं....!
न जाने कितने
काल कलवित हैं....?
चौतरफा
संक्रमण है...!
इंसानियत
गुम-सुम है..!
चूल्हे जल
नहीं पा रहे हैं...!
फिर भी नेता
अपनी रोटी
सेंक रहे हैं...!
सत्ता उत्सव में
डूबी हुई है...!
जन-पीड़ा को
भूली हुई है....!
काश कुछ करोड़
राहत में लगाते..!
"संतोष" कुछ तो
राहत दे जाते ....!
सत्ता में गुंडे हों या
गुंडों की हो सत्ता ....!
कोई फर्क नहीं
अलबत्ता .....!
अब नाम की
जन-सत्ता...!
गुंडे तो गुंडे हैं.
पुलिस बसूले
अब हफ्ता....?
बच्चे-बूढ़े,
महिलाओं पर
खूब लगाएं
वो लत्ता....?
जनता के
पैसे हों,
या हो सरकारी
खर्चा ...!
मौज मनाये
अब सत्ता...?
कोई फर्क नहीं
अलबत्ता.....!
जनता जब
सोती है....!
अपना हक़
खोती है .....!
"संतोष" अब तो
जागो जन-बच्चा.....!
कोई फर्क नहीं
अलबत्ता...!
सत्ता में गुंडे हों
या गुंडों की
हो सत्ता ......?
अहम् अपने
आगे औरों को
बढ़ने नही देता ....!
अपनी सीढ़ी
औरों को
चढ़ने नहीं देता ...?

शहर कि फ़िज़ां को देख
अब पंक्षी भी घबराते हैं...!
उन्मुक्त आज़ादी की बात
सोच कर ही डर जाते हैं ...!
सहमा-सहमा है हर एक चेहरा,
मंज़र भी मंज़र से भय खाते हैं...!
सर्दी के इस मौसम में भी,
न जाने क्यूँ पसीने छूट जाते हैं....?
जो देते थे दुहाई भाई चारे की,
अब उन्ही के हाथ में पत्थर नज़र आते हैं....!
करते थे दावा जो हवाओं का रुख बदलने का,
हवाओं के रुख से वो खुद बदल जाते हैं..!
बात कैसे करें दिल मिलाने की,
अब आँख मिलाने से लोग डर जाते हैं...!
इंसानों की बस्ती में रहते हुए भी,
खुद को इंसान बताने में डर जाते हैं...?
दिन के उजालों में हम इस कद्र छले गए,
अब तो चिरागों से भी सिहर जाते हैं....!
"संतोष"अमन से हैवानियत कभी जीत सकती नहीं,
दहशत के काले बादल तो आते हैं जाते हैं....!
मन के लड्डू
आत्म प्रशंसा
चट खा जाती है ....!
और झट
आत्म मुग्धता
बढ़ा जाती है ....!
आत्म मुग्धता
आँखों में अंधकार
ला जाती है ...!
तभी खुद की
तसवीर भी
साफ नज़र
नहीं आती है...?