Sunday, February 23, 2014

किसी को कंहा है खुद की खबर
कैसा होगा ये ज़िंदगी का सफ़र..?

हर मोड़ पर नई है ज़िंदगी की डगर ...!
हादसों से सबक हमने सीखा मगर ....!

अपने- बेगाने,बेगाने -अपने बनते रहे .
हम रखते हैं अपनी, मंज़िल पर नज़र ...!

हमारी चाहत मे डूबे  हैं वो इस तरह
खुद को भूले न रही ज़माने की खबर ....!

नफरत के चिरागों से रौशनी मुमकिन नहीं,
रौशनी मुहब्बत की देती है,रोशन सा घर ..!

हर रंगो से रंगी हुई है ये नवरंग ज़िंदगी,
कोई रंगो में लिपटा,तो कोई है बे-असर  ...?

"संतोष"ज़िंदगी के फलसफे ज़ुदा ज़ुदा ही सही
पर इश्क ज़िंदगी से किसी का नहीं है कमतर ..?

Wednesday, February 19, 2014

अँधेरे से जिनकी हो गई है यारी 

उजाले उन्ही से जले जा रहे हैं ...?


नफरतों के साये में जो बस रहे हैं 

तराने वफ़ा के अब वही गा रहे हैं...!



हज़ारों दाग लगे हैं दामन पर जिनके

वही अब नेकी बयां किये जा रहे हैं ...!


तमन्नाओं की कश्ती डूबी इस जंहा में,

अरमान फिर भी जंहा से रखे जा रहे हैं ...!


हर शक्श सहमा सा बुझता सा दिखता,

मॅहगाई के तलवे में, सारे दबे जा रहे है,,,!


ब्यवसाय बनी है अब यंहा राजनीति ...

आम-जन इन्ही से, अब ठगे जा रहे हैं ....!


कंही महलों की महकती, खुशबु है बिखरी

कंही गर्दिशे -गम में, वो बिखरे जा रहे हैं...


खुशियों के दामन से कुछ सिमटे हैं बैठे

"संतोष" हम गम से ही निखरे जा रहे हैं ....!
आदमी के अंदर 

भी हैं कई आदमी ...!


पर आदमियत से 


मरहूम है हर आदमी..?
सपनो का सौदागर
 
मुंगेरीलाल 

साबित हुआ...?


दिल्ली को सपने 


दिखा के खुद 


खोदा कुंआ ...?

Thursday, February 13, 2014

मैंने कल
चाहतों की
सब किताबें
फाड़ दी;
सिर्फ एक
कागज़ पर
लफ्जे माँ
रहने दिया है
क्यूँ की
दुनिया में
'संतोष' माँ
ने ही चाहत
"लफ्ज"
दुनिया को
दिया है ....?
प्यार का प्रथम
इज़हार माँ को
समर्पित है...!
क्यूँ कि पहला
प्यार माँ
द्वारा ही
दुनिया को
अर्पित है....!
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शुभ वेलेंटाइन डे 

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सांसदों में गर
पानी होता ...?
तो सांसद
मर्यादा
न खोता....?
संसद
पानी पानी
न होती....?
गरिमा भी
सकुचानी
न होती....?
संसद की
मर्यादा
भंग हुई ....?
क्यूँ अब
मानसिकता
इतनी तंग हुई ....?

Thursday, February 6, 2014

प्रेम का
मधुर
राग.
अनुराग ...!
प्रेम की
गहन
अभिब्यक्ति...
अनुरक्ति ....!
माँ नर्मदा की पावन जयंती पर नर्मदा जी के चरणों में सादर समर्पित..

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नर्मदा की पावन जलधार...!
करती हम सबका बेड़ापार ...!

जिनके दर्शन में चमत्कार ...!
दर्शन से ही करती जो उद्धार ...!

माघ शुक्ल सप्तमी का अवतार ...
हर कंकड़ शंकर है शिवाकार ...!

अमरकंटक से लेती हैं आकार...!
रत्नासागर में समाहित जलधार ..!

पाप हरण कर करती कल्याण ..!
हम सब करते उनका गुण-गान...!

अज़र अमर का जिनको वरदान ..!
प्रदक्षिणा जिनकी है सदा महान ....!

जिनका तट है सुर्भीक्ष समान ...!
"संतोष" पड़ा तेरी शरण में आन ...!

नमामि जय जय माँ देवी नर्मदे ...!
हम भक्तों के भय,चिंता सब हर दे ...!
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संतोष कुमार नेमा "संतोष"
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Monday, February 3, 2014

ऋतू बसंत की
फ़िज़ां आ गयी है ...!
तन-मन पर
बासन्ती घटा
छा गयी है .
भोरों में अब भी
सनक वही है ...!
पर कलियों में वो
मेहक नहीं है
बाग-बगीचे
बौरा गए हैं ...!
गुलशन में अब
भौरां नए हैं...!
कोयल भी अब
मधुर गीत
है गाये ..!
पीली सरसों
अम्बर पर छाये...!
नव-उमंग
नव-तरंग
है लाया ....!
मन-मोहक
मधुर बसंत
है आया...!
तितलियाँ
इठलाके
नाच रही हैं...!
बच्चे-बूढ़े
सब के मन को
जाँच रही हैं...?
वीणा वादिनी
हम को ऐसे
स्वर दें ....!
जन-जन में
हम नवरंग
भर दें ....!
"संतोष" ऋतू
बसंत की मस्ती में
मदहोश हुआ है...!
फिर भी देखो
असंतोष हुआ है ...?
पहले आदमी
की सही
पहिचान
उसके
आचार-विचार
ब्यवहार
हुआ करते थे ...!
अब जन -धन
कदाचार
हुआ करते हैं...!
सदाचार के
ठेकेदार
अब ज़ैल में
घूमा करते हैं ...?
कलम और तलवार
किसकी है तेज धार...?

कौन करता चौतरफा वार ...?
किससे से डरती है सरकार...?

कलम के आगे सब लाचार ..?
कलम कराती हा हा कार ...!

कलम निकलवाती है तलवार...?
कलम ही बहाती शांति बयार ....!

कलम रखती सामाजिक सरोकार ...!
कलम के बिना सूना है सब संसार ...!

कलम की ताकत है अपार .!
कलम फैलाती प्यार ही प्यार ...!

कलम है दुहरी दो धारी तलवार ..
शांति और क्रांति दोनों पर सवार ..!

तलवार बढ़ाती भय और अत्याचार ...!
कलम सिखाती, सामाजिक संस्कार ...!

'संतोष' कलम है जीवन आधार ...!
कलम की लाठी करती अंधी मार ...!