Sunday, February 23, 2014

किसी को कंहा है खुद की खबर
कैसा होगा ये ज़िंदगी का सफ़र..?

हर मोड़ पर नई है ज़िंदगी की डगर ...!
हादसों से सबक हमने सीखा मगर ....!

अपने- बेगाने,बेगाने -अपने बनते रहे .
हम रखते हैं अपनी, मंज़िल पर नज़र ...!

हमारी चाहत मे डूबे  हैं वो इस तरह
खुद को भूले न रही ज़माने की खबर ....!

नफरत के चिरागों से रौशनी मुमकिन नहीं,
रौशनी मुहब्बत की देती है,रोशन सा घर ..!

हर रंगो से रंगी हुई है ये नवरंग ज़िंदगी,
कोई रंगो में लिपटा,तो कोई है बे-असर  ...?

"संतोष"ज़िंदगी के फलसफे ज़ुदा ज़ुदा ही सही
पर इश्क ज़िंदगी से किसी का नहीं है कमतर ..?

No comments:

Post a Comment