Wednesday, January 29, 2014

दिल और दिमाग की ज़ंग 

दोनों आपस में
बुरी तरह 
झगड़ रहे थे 
किसी मुद्दे पर
तर्क-कुतर्क
कर रहे थे ...!
दिमाग दिल पर
हावी था ...!
क्यूँ की सवाल
जजबाती था ...!
दिल अपना
मिज़ाज़ बदलने
न राजी था ...!
दिमाग बोला
तुम अपना
रिवाज़ बदलो ...!
दिल ने कहा
तुम अपना
अंदाज़ बदलो...!
हर बक्त
नफा-नुकशान का
हिसाब लगाते हो...!
इंसानी रिश्तों को
सदा झुठलाते हो...?
दिमाग झट तनाव
में आया ...!
जोर से ऊँचे स्वर में
चिल्लाया ....!
हर बक्त भावनाओं,
संवेदनाओं से
घिरे रहते हो...!
धोखा खाते ही,
मुझे दोष देते हो...!
कुछ तो मेरा भी
इस्तेमाल करो....!
और मुझे भी
साथ लेकर चलो...!
दिल को दिमाग का
ये सुझाव रास आया ....!
फिर दोनों
मुस्कराये....!
ख़ुशी से
हाथ मिलाये ...!
अब हम आपसी
समझ-सामंजस्य
से काम लेंगे ...!
तभी "संतोष"
फैसलों को
अंज़ाम देंगें ....?
पैसा और सिद्धांत 

दोनों एक साथ 


नहीं चलते...!


तभी तो दोनों 


के कुंडली 


मिलान नहीं 


मिलते....?


जीवन आधार


जंहा पैसा है ...

वंहा सिद्धांत


कैसा है...?
जंहा सिद्धांत 


टिका है ...!
वंहा पैसा 


डिगा है....!
हर बक्त नाकाम होंगी खुसबू को कैद करने की कोशिशें ...!

"संतोष" रौशनी की एक किरण अँधेरे को चीर जाती है...!

निंदा रस

सहज सरस...!


जिसके आगे 


सब बे-बस...!

Tuesday, January 28, 2014

ख़ुशी की तलाश में हम 
गम के करीब हो गए...!

ख़ुशी के रास्ते भी अब 
कितने अज़ीब हो गए ...!

झूठ की सवारी कर हम
अब खुशनसीब हो गए...?

कैसी हैं बक्त की मजबूरियां ...?
जो हबीब थे,वो रक़ीब हो गए....!

सच का सामना दो पल न कर सकें,
हम अब इतने, बद-नसीब हो गए ...!

ज़माने के साथ चलते चलते "संतोष"
झूठ-फरेब के कितने करीब हो गए ..?
दिल और दिमाग की ज़ंग 

दोनों आपस में
बुरी तरह 
झगड़ रहे थे 
किसी मुद्दे पर
तर्क-कुतर्क
कर रहे थे ...!
दिमाग दिल पर
हावी था ...!
क्यूँ की सवाल
जजबाती था ...!
दिल अपना
मिज़ाज़ बदलने
न राजी था ...!
दिमाग बोला
तुम अपना
रिवाज़ बदलो ...!
दिल ने कहा
तुम अपना
अंदाज़ बदलो...!
हर बक्त
नफा-नुकशान का
हिसाब लगाते हो...!
इंसानी रिश्तों को
सदा झुठलाते हो...?
दिमाग झट तनाव
में आया ...!
जोर से ऊँचे स्वर में
चिल्लाया ....!
हर बक्त भावनाओं,
संवेदनाओं से
घिरे रहते हो...!
धोखा खाते ही,
मुझे दोष देते हो...!
कुछ तो मेरा भी
इस्तेमाल करो....!
और मुझे भी
साथ लेकर चलो...!
दिल को दिमाग का
ये सुझाव रास आया ....!
फिर दोनों
मुस्कराये....!
ख़ुशी से
हाथ मिलाये ...!
अब हम आपसी
समझ-सामंजस्य
से काम लेंगे ...!
तभी "संतोष"
फैसलों को
अंज़ाम देंगें ....?

Monday, January 27, 2014

में जब भी लिखता हूँ दिले-गुबार लिखता हूँ...!
खिज़ां के मौसम में, फसले -बहार लिखता हूँ ...!
नफरतों की बस्ती में, प्यार ही प्यार लिखता हूँ...!
वो गम दें या ख़ुशी, में गमख्वार लिखता हूँ ...!
धनवानों के धन की, में बढ़ती रफ़्तार लिखता हूँ ...
मुफलिसी की नाव की,फिसलती पतवार लिखता हूँ ....!
मेहनत कश आवाम की, जय जय कार लिखता हूँ....!
जुमले जालिमों के जुल्म के , में सौ बार लिखता हुँ....!
भ्रस्ट ब्यवस्था उजागर करने , भ्रस्टाचार लिखता हूँ ...!
शोषण और अन्याय के खिलाफ, इंक़लाब लिखता हूँ...!
जन-जन की हर पीड़ा को, में बे-हिसाब लिखता हूँ...
भूख,गरीबी,बेकारी पर,सत्ता की हरयाली पर दो टूक लिखता हूँ....!
मेहगाई की मार से मरते,नंगे-भूखे इंसानों की भूख लिखता हूँ .....!
पाक की नापाकगी पर,आतंकी करतूतों पर बे-खौफ लिखता हूँ...!
बेतहासा बढ़ती नेताओं की धन-दौलत को, सरकारी मौज लिखता हूँ ...?
गम की स्याह रातों में, रौशनी की बयार लिखता हूँ...
आम आदमी के दर्द को "संतोष' हज़ार बार लिखता हूँ ....!
युवाओ ...
आपका.....
जोशो-जूनून
रंग तो ..
लाता है....!
पर अनुभव
हीनता से ,
बद -रंग
हो जाता है...?
अनुभव का,
जोशो-जूनून से,
गहरा नाता है...!
जब भी इनके
साथ आता है...
रंगों में भी,
रंग भर जाता है....!
ये पंचायतें भी,
गज़ब ढा रही हैं....!
प्यार की सजा
गेंग-रेप से
दिला रही हैं...?
क्या..?
पंचायती राज्य
का ये ही
पैगाम है...?
लोकतंत्र में,
इंसानियत का
कत्ले-आम है...?
अब इनके
फैसलों पर भी
इन्ही के हिमायती
चाहते लगाम हैं...!
पंचायतों के
बे-तरकीब
फैसले जबरन
सरअंजाम हैं....!
'संतोष'अब
सरकारी मूकता.भी...
सरेआम है....?
काँटों के बीच
जीभ एक
नाज़ुक सी
कली...?
जीभ की
फितरत
अच्छी या भली....!
ये तो इसके
प्रयोग पर टली...!
"संतोष"जीभ जब
भी चली ...!
कंही राहत
तो कंही
आफत बढ़ी ...!

Thursday, January 23, 2014

लोग बे-मौत
मर रहे हैं...!
सर्दी से
ठुठर रहे हैं ...!
भूख से
कराह रहे हैं....!
बीमार बूढ़े-बच्चे,
दवा चाह रहे हैं ....!
माँ-बहिने
आशंकित हैं....!
न जाने कितने
काल कलवित हैं....?
चौतरफा
संक्रमण है...!
इंसानियत
गुम-सुम है..!
चूल्हे जल
नहीं पा रहे हैं...!
फिर भी नेता
अपनी रोटी
सेंक रहे हैं...!
सत्ता उत्सव में
डूबी हुई है...!
जन-पीड़ा को
भूली हुई है....!
काश कुछ करोड़
राहत में लगाते..!
"संतोष" कुछ तो
राहत दे जाते ....!
सत्ता में गुंडे हों या
गुंडों की हो सत्ता ....!
कोई फर्क नहीं
अलबत्ता .....!
अब नाम की
जन-सत्ता...!
गुंडे तो गुंडे हैं.
पुलिस बसूले
अब हफ्ता....?
बच्चे-बूढ़े,
महिलाओं पर
खूब लगाएं
वो लत्ता....?
जनता के
पैसे हों,
या हो सरकारी
खर्चा ...!
मौज मनाये
अब सत्ता...?
कोई फर्क नहीं
अलबत्ता.....!
जनता जब
सोती है....!
अपना हक़
खोती है .....!
"संतोष" अब तो
जागो जन-बच्चा.....!
कोई फर्क नहीं
अलबत्ता...!
सत्ता में गुंडे हों
या गुंडों की
हो सत्ता ......?
अहम् अपने
आगे औरों को
बढ़ने नही देता ....!
अपनी सीढ़ी
औरों को
चढ़ने नहीं देता ...?

शहर कि फ़िज़ां को देख
अब पंक्षी भी घबराते हैं...!
उन्मुक्त आज़ादी की बात
सोच कर ही डर जाते हैं ...!
सहमा-सहमा है हर एक चेहरा,
मंज़र भी मंज़र से भय खाते हैं...!
सर्दी के इस मौसम में भी,
न जाने क्यूँ पसीने छूट जाते हैं....?
जो देते थे दुहाई भाई चारे की,
अब उन्ही के हाथ में पत्थर नज़र आते हैं....!
करते थे दावा जो हवाओं का रुख बदलने का,
हवाओं के रुख से वो खुद बदल जाते हैं..!
बात कैसे करें दिल मिलाने की,
अब आँख मिलाने से लोग डर जाते हैं...!
इंसानों की बस्ती में रहते हुए भी,
खुद को इंसान बताने में डर जाते हैं...?
दिन के उजालों में हम इस कद्र छले गए,
अब तो चिरागों से भी सिहर जाते हैं....!
"संतोष"अमन से हैवानियत कभी जीत सकती नहीं,
दहशत के काले बादल तो आते हैं जाते हैं....!
मन के लड्डू
आत्म प्रशंसा
चट खा जाती है ....!
और झट
आत्म मुग्धता
बढ़ा जाती है ....!
आत्म मुग्धता
आँखों में अंधकार
ला जाती है ...!
तभी खुद की
तसवीर भी
साफ नज़र
नहीं आती है...?