शहर कि फ़िज़ां को देख
अब पंक्षी भी घबराते हैं...!
उन्मुक्त आज़ादी की बात
सोच कर ही डर जाते हैं ...!
सहमा-सहमा है हर एक चेहरा,
मंज़र भी मंज़र से भय खाते हैं...!
सर्दी के इस मौसम में भी,
न जाने क्यूँ पसीने छूट जाते हैं....?
जो देते थे दुहाई भाई चारे की,
अब उन्ही के हाथ में पत्थर नज़र आते हैं....!
करते थे दावा जो हवाओं का रुख बदलने का,
हवाओं के रुख से वो खुद बदल जाते हैं..!
बात कैसे करें दिल मिलाने की,
अब आँख मिलाने से लोग डर जाते हैं...!
इंसानों की बस्ती में रहते हुए भी,
खुद को इंसान बताने में डर जाते हैं...?
दिन के उजालों में हम इस कद्र छले गए,
अब तो चिरागों से भी सिहर जाते हैं....!
"संतोष"अमन से हैवानियत कभी जीत सकती नहीं,
दहशत के काले बादल तो आते हैं जाते हैं....!
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