Thursday, October 24, 2013

PYAJ KI KAHANI

प्याज जब,
इतराके,इठलाके,
फलों से बोली..
मुझसे अब नहीं
करना हंसी ठिठोली...!
में अब आम नहीं,
ख़ास हो गई हूँ ...!
सब्जी क्या...!
अब में फलों की भी
बॉस हो गई हूँ ...!
ये सुन शेव ने ,
जरा ऐतराज किया ...!
कहा तुमने रुलाने,
के अलावा क्या किया...?
हम तो लोगो को,
सेहत और
ताकत देते हैं .
और उसकी सही,
कीमत लेते हैं...!
प्याज गुस्से से,
बोखलाई...!
हमारे दुर्दिनों में,
हमें किसने पूछा भाई...?
आज हम जिस
मुकाम पर हैं ...
अपने दम से ,
राजनीती के
काम पर हैं ...!
हमारे नाम से,
सरकारें बदल
जाती हैं...!
जनता भाव सुन
दहल जाती है ...!
अब हमारे सर पर,
ही ताज है...!
जन्हा देखो वंहा ,
चर्चा में "संतोष"सिर्फ,
प्याज ही प्याज है...?

Saturday, October 19, 2013

वो मर्दानगी,
जाँच में पास,
हो गए....!
राम के तो,
न हो सके,
पर माया के,
ख़ास हो गए...!  


Thursday, October 17, 2013

अब बिन ब्याहे ही
आटे- दाल का भाव
पता चल रहा है...!
शिक्षित युवा
बेरोजगारी से,
हाथ मल रहा है...?
देश की मिटटी तो पहले से ही सोना उगल रही है.
ये और बात है की राजनीती उसे निगल रही है
अब फिर एक संत के सपने ने खुदाई शुरू करा दी है .

सोने की मृग-तृष्णा ने बहुतेरों की नींद उडा दी है ..?

Friday, October 11, 2013

माँ के चरणों में सादर समर्पित

दुनियां में इंसा की सच्ची पहचान है माँ ..!
मेरे लिए तो रामायण,गीता कुरान है माँ ...!
हमारे दिल की धडकनों की जान है माँ ..!
संकट के क्षणों में मेरी तो भगवान है माँ...!
प्रेमाचल है जिसका ममता से धनवान है मा...!
साक्षात् दया की मूरत ऐसी दयावान है माँ...!
खुद जागी कभी भूखी रही मेरे लिए बरदान है माँ ...!
मेरा कतरा कतरा लहू का, तुझ पर कुर्बान है माँ ...!
सबसे ऊँचा है ओहदा जिसका,ब्रम्ह की वो विधान है माँ...!
चरणों में जो भी आजाता , करती सदा कल्याण है माँ ...!
तू ही दुर्गा,तू ही सीता,तू ही काली शत शत तुझे प्रणाम है माँ...!
तेरा कर्ज न कभी अदा कर पायें,हम तो सदा तेरे गुलाम हैं माँ...!
हर भूल हमारी क्षमा कर देती, ऐसी क्षमादान है माँ...!
हर मुश्किल आसां कर देती, "संतोष' ऐसी एक विज्ञानं है माँ...!
नाम पर कलंक ...?
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जिसके नाम में लगा हो राम ...!
कैसे करता वो घटिया काम ...?
धर्म को करता वो बदनाम ...!
उसे चाहिए थी नित नई चाम..!
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जिसके नाम में लगा हो साईं...!
उसमे चरित्र हीनता कैसे आई ...?
बंद करो ये धर्म का धंधा भाई...!
जनता भी अब है बौखलाई ...?
भ्रस्टाचार अब
ब्योहार में
आ गया है ..!
सारे बर्ग-भेद,
भुलाकर,
हर तबके को
लुभा गया है ...!
तीज-त्योहारों के,
नाम पर अब,
खुलकर छा गया है.. !
लोगो को ये नया,
शिष्टाचार
खूब भा गया है...?

Thursday, October 3, 2013


आत्मा की आत्म कथा....?

जैसे ही आत्मा मानव ,
शरीर से मुक्त हुई...!
दुनिया में आते ही,
वो उन्मुक्त हुई ...!
आत्मा की ख़ुशी,
देख भगवन ने पूछा ...!
क्या तुम्हे मानव तन ,
चाहिए कोई दूजा...?
आत्मा थोड़ी घबराई .,
थोड़ी सकुचाई....!
भगवन मानव तन में ,
रह कर भी में मानव की,
थाह न ले पाई..?
मानव तन की ,
अदभुत है अनुभूति ..!
मानव की मुझे छोड़,
सिर्फ अपने तन पर,
ही है प्रीति...!
भगवन ने
हंस कर कहा...!
मानव तन को तो,
देवता भी तरस गया....!
आत्मा बोली भगवन,
दूर के ढोल सुहावने ...!
ये दिखते सिर्फ हैं लुभावने ....!
मुझसे इनका,
कुछ नहीं छिपा है ...!
अन्दर रहकर,
मुझे सब दिखा है ...!
अपने स्वार्थ की खातिर,
मुझे भी बेच देते है...?
और मेरे बदले,
जरा सी ख़ुशी ले लेते हैं ...!
गीता,वेद,पुराण.एवं शास्त्र सभी.
कहते हैं मुझको अमर सभी ..!
पर बक्त आने पर ये,
मुझे भी मार डालते हैं...!
फिर इस फरेबी दुनिया से ,
अपना मतलब निकलते हैं...!
कुछ तो मुझे गिरवी रख,
अपना काम चलाते हैं...!
दुनिया की नज़र में,
ये बुद्धिजीवी कहलाते हैं...?
इन्सान का बहुरुप्यापन,
मैंने करीब से देखा है...!
बेहतर तो जानवर हैं,
जिनके तन-मन में एका है...!
प्रभु जब तक आपने ,
मानव तन,
में हैं प्राण दिए...!
तब तक हमने साथ दिया ,
फ़र्ज़ हमने भी हैं निभा दिए...!
सुन आत्मा की ब्यथा कथा..!
बोले भगवन फ़र्ज़ ,
तेरा ब्यर्थ न जायेगा...?
ये इंसा है "संतोष"
एक दिन संकट में,
फिर मेरी चोंखट पर,
आएगा...?