Thursday, October 24, 2013
Saturday, October 19, 2013
Thursday, October 17, 2013
Friday, October 11, 2013
माँ के चरणों में सादर समर्पित
दुनियां में इंसा की सच्ची पहचान है माँ ..!
मेरे लिए तो रामायण,गीता कुरान है माँ ...!
हमारे दिल की धडकनों की जान है माँ ..!
संकट के क्षणों में मेरी तो भगवान है माँ...!
प्रेमाचल है जिसका ममता से धनवान है मा...!
साक्षात् दया की मूरत ऐसी दयावान है माँ...!
खुद जागी कभी भूखी रही मेरे लिए बरदान है माँ ...!
मेरा कतरा कतरा लहू का, तुझ पर कुर्बान है माँ ...!
सबसे ऊँचा है ओहदा जिसका,ब्रम्ह की वो विधान है माँ...!
चरणों में जो भी आजाता , करती सदा कल्याण है माँ ...!
तू ही दुर्गा,तू ही सीता,तू ही काली शत शत तुझे प्रणाम है माँ...!
तेरा कर्ज न कभी अदा कर पायें,हम तो सदा तेरे गुलाम हैं माँ...!
हर भूल हमारी क्षमा कर देती, ऐसी क्षमादान है माँ...!
हर मुश्किल आसां कर देती, "संतोष' ऐसी एक विज्ञानं है माँ...!
Thursday, October 3, 2013
आत्मा की आत्म कथा....?
जैसे ही आत्मा मानव ,
शरीर से मुक्त हुई...!
दुनिया में आते ही,
वो उन्मुक्त हुई ...!
आत्मा की ख़ुशी,
देख भगवन ने पूछा ...!
क्या तुम्हे मानव तन ,
चाहिए कोई दूजा...?
आत्मा थोड़ी घबराई .,
थोड़ी सकुचाई....!
भगवन मानव तन में ,
रह कर भी में मानव की,
थाह न ले पाई..?
मानव तन की ,
अदभुत है अनुभूति ..!
मानव की मुझे छोड़,
सिर्फ अपने तन पर,
ही है प्रीति...!
भगवन ने
हंस कर कहा...!
मानव तन को तो,
देवता भी तरस गया....!
आत्मा बोली भगवन,
दूर के ढोल सुहावने ...!
ये दिखते सिर्फ हैं लुभावने ....!
मुझसे इनका,
कुछ नहीं छिपा है ...!
अन्दर रहकर,
मुझे सब दिखा है ...!
अपने स्वार्थ की खातिर,
मुझे भी बेच देते है...?
और मेरे बदले,
जरा सी ख़ुशी ले लेते हैं ...!
गीता,वेद,पुराण.एवं शास्त्र सभी.
कहते हैं मुझको अमर सभी ..!
पर बक्त आने पर ये,
मुझे भी मार डालते हैं...!
फिर इस फरेबी दुनिया से ,
अपना मतलब निकलते हैं...!
कुछ तो मुझे गिरवी रख,
अपना काम चलाते हैं...!
दुनिया की नज़र में,
ये बुद्धिजीवी कहलाते हैं...?
इन्सान का बहुरुप्यापन,
मैंने करीब से देखा है...!
बेहतर तो जानवर हैं,
जिनके तन-मन में एका है...!
प्रभु जब तक आपने ,
मानव तन,
में हैं प्राण दिए...!
तब तक हमने साथ दिया ,
फ़र्ज़ हमने भी हैं निभा दिए...!
सुन आत्मा की ब्यथा कथा..!
बोले भगवन फ़र्ज़ ,
तेरा ब्यर्थ न जायेगा...?
ये इंसा है "संतोष"
एक दिन संकट में,
फिर मेरी चोंखट पर,
आएगा...?
आत्मा की आत्म कथा....?
जैसे ही आत्मा मानव ,
शरीर से मुक्त हुई...!
दुनिया में आते ही,
वो उन्मुक्त हुई ...!
आत्मा की ख़ुशी,
देख भगवन ने पूछा ...!
क्या तुम्हे मानव तन ,
चाहिए कोई दूजा...?
आत्मा थोड़ी घबराई .,
थोड़ी सकुचाई....!
भगवन मानव तन में ,
रह कर भी में मानव की,
थाह न ले पाई..?
मानव तन की ,
अदभुत है अनुभूति ..!
मानव की मुझे छोड़,
सिर्फ अपने तन पर,
ही है प्रीति...!
भगवन ने
हंस कर कहा...!
मानव तन को तो,
देवता भी तरस गया....!
आत्मा बोली भगवन,
दूर के ढोल सुहावने ...!
ये दिखते सिर्फ हैं लुभावने ....!
मुझसे इनका,
कुछ नहीं छिपा है ...!
अन्दर रहकर,
मुझे सब दिखा है ...!
अपने स्वार्थ की खातिर,
मुझे भी बेच देते है...?
और मेरे बदले,
जरा सी ख़ुशी ले लेते हैं ...!
गीता,वेद,पुराण.एवं शास्त्र सभी.
कहते हैं मुझको अमर सभी ..!
पर बक्त आने पर ये,
मुझे भी मार डालते हैं...!
फिर इस फरेबी दुनिया से ,
अपना मतलब निकलते हैं...!
कुछ तो मुझे गिरवी रख,
अपना काम चलाते हैं...!
दुनिया की नज़र में,
ये बुद्धिजीवी कहलाते हैं...?
इन्सान का बहुरुप्यापन,
मैंने करीब से देखा है...!
बेहतर तो जानवर हैं,
जिनके तन-मन में एका है...!
प्रभु जब तक आपने ,
मानव तन,
में हैं प्राण दिए...!
तब तक हमने साथ दिया ,
फ़र्ज़ हमने भी हैं निभा दिए...!
सुन आत्मा की ब्यथा कथा..!
बोले भगवन फ़र्ज़ ,
तेरा ब्यर्थ न जायेगा...?
ये इंसा है "संतोष"
एक दिन संकट में,
फिर मेरी चोंखट पर,
आएगा...?
जैसे ही आत्मा मानव ,
शरीर से मुक्त हुई...!
दुनिया में आते ही,
वो उन्मुक्त हुई ...!
आत्मा की ख़ुशी,
देख भगवन ने पूछा ...!
क्या तुम्हे मानव तन ,
चाहिए कोई दूजा...?
आत्मा थोड़ी घबराई .,
थोड़ी सकुचाई....!
भगवन मानव तन में ,
रह कर भी में मानव की,
थाह न ले पाई..?
मानव तन की ,
अदभुत है अनुभूति ..!
मानव की मुझे छोड़,
सिर्फ अपने तन पर,
ही है प्रीति...!
भगवन ने
हंस कर कहा...!
मानव तन को तो,
देवता भी तरस गया....!
आत्मा बोली भगवन,
दूर के ढोल सुहावने ...!
ये दिखते सिर्फ हैं लुभावने ....!
मुझसे इनका,
कुछ नहीं छिपा है ...!
अन्दर रहकर,
मुझे सब दिखा है ...!
अपने स्वार्थ की खातिर,
मुझे भी बेच देते है...?
और मेरे बदले,
जरा सी ख़ुशी ले लेते हैं ...!
गीता,वेद,पुराण.एवं शास्त्र सभी.
कहते हैं मुझको अमर सभी ..!
पर बक्त आने पर ये,
मुझे भी मार डालते हैं...!
फिर इस फरेबी दुनिया से ,
अपना मतलब निकलते हैं...!
कुछ तो मुझे गिरवी रख,
अपना काम चलाते हैं...!
दुनिया की नज़र में,
ये बुद्धिजीवी कहलाते हैं...?
इन्सान का बहुरुप्यापन,
मैंने करीब से देखा है...!
बेहतर तो जानवर हैं,
जिनके तन-मन में एका है...!
प्रभु जब तक आपने ,
मानव तन,
में हैं प्राण दिए...!
तब तक हमने साथ दिया ,
फ़र्ज़ हमने भी हैं निभा दिए...!
सुन आत्मा की ब्यथा कथा..!
बोले भगवन फ़र्ज़ ,
तेरा ब्यर्थ न जायेगा...?
ये इंसा है "संतोष"
एक दिन संकट में,
फिर मेरी चोंखट पर,
आएगा...?
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