Thursday, April 10, 2014

मुसीबतों में ही इंसान की पहचान होती है....!
ग़मों के साये में ही आस्था जवान होती है...!

बे-शक रहें अपने अपने यक़ीनो के साथ
इन यक़ीनों से ही खुदाई महान होती है....!

यूँ तो बुरे-बक्त में, मंजूर है हमें हर मशविरा,
जुवां चुप है मुसीबत आँखों से बयान होती है....!

वफ़ा के बंधनों के नाम, ज़माने में बहुत हैं मगर
रिश्ते-नाते,दोस्ती की,बक्त से पहचान होती है...!

दौरे मुसीबत में, हर दर पै सज़दे करते हैं लोग,
उसी के नूर से ही रूहानी चाहत जवान होती है....!

दिलों पर काबिज़ हो जाती हैं ये तंग तन्हाईयाँ,
जब भी मुश्किलों में उलझी, हमारी जान होती है....!

"संतोष"दर्द दिल का किस किस को सुनाएंगे हम
सब्र रखना मुनासिब है,हौसलों में ही जान होती है ....!

Wednesday, April 9, 2014

मंदिर मस्ज़िद और गुरुद्वारों में...
चर्च तथा तीर्थों के गलियारों में ...!
बहुत खोजा पर सतोष न मिला....

रहीसों और नेताओं की बस्ती में,
पूंजी-पतियों की अनंत मस्ती में
बहुत खोजा पर संतोष न मिला......

यज्ञों की पावन अग्नि ज्वालाओं में
मन के फेर की मन मालाओं में ..
बहुत खोजा पर संतोष न मिला.....

गंगा-यमुना के हर पावन तट में....
काशी जैसे शमशानों के मरघट में ..
बहुत खोजा पर संतोष न मिला.......!

चारों धाम की मंगल तीर्थ यात्राओं में...
गीता,वेद-पुराण और धर्म-शाश्त्रो में
बहुत खोजा पर संतोष न मिला.......!

बाबा-बैरागियों की धर्म की खोली में
बे-बस, मजबूर की याचक झोली में ...!
बहुत खोजा पर संतोष न मिला .....

मात-पिता के पावन हरि से चरणो में
मन-मंदिर के अंदर बहते झरनों में
जब दिल से खोजा तब "संतोष" मिला...!
अब बड़ा सचेत है
ये आम आदमी...!
देखने में सहज
पर बड़ा तेज है
ये आम आदमी...!
करता किसी से
नहीं परहेज है
ये आम आदमी...!
कोई देता है जब
इसे झूठा झांसा
देता है वोट का
क़ानूनी तमाचा
ये आम आदमी...!
भूख-गरीबी,बेकारी 
महगाई से त्रस्त है
ये आम आदमी ...!
भ्रस्ट-ब्यवस्था
नेता-गिरी से पस्त है
ये आम आदमी...!
पेट की आग को
बुझाने में ब्यस्त है
ये आम आदमी...!
अपनी ही समस्याओं
से बड़ा ग्रस्त है
ये आम आदमी....!
पांच वर्षों में मिलता है
"संतोष"इसे मौका
तभी अपना हक़
जताने में मस्त है
ये आम आदमी...! 

Thursday, April 3, 2014

गर ज़िंदा हैं तो ज़िंदा होने का कुछ तो सबूत दीजिये ....!
सरे राह तड़पती मानवता पर, कुछ तो हुज़ूर कीजिये ...!
मरती संवेदनाओं को, जरा कुछ तो जीवंत कीजिये...!
नव-बालाओं,अबलाओं को समाज में बलवंत कीजिये
गर भ्रस्टाचार रोक न सकें,पर भ्रस्टाचार न कीजिये...?
सदाचार न सही न करें, पर कदाचार तो न कीजिये.. !
वोट की खातिर नेताओ, प्रजातंत्र पर प्रहार न कीजिये...!
अमन-चैन की बस्ती में, जाति-धर्म का वार न कीजिये...?
इंसानियत की राह में, इंसानियत से इंकार न कीजिये...!
कायम रहे भाईचारा,बे-बजह आपसी तकरार न कीजिये...!
रखें अपनी ख्वाहिशेों पर काबू,इक्छायें बे-शुमार न कीजिये...!
धन-दौलत की अंधी दौड़ में, गैर-बाजिब ब्यापार न कीजिये....!
"संतोष" ज़माने में हर शक्श पर, यूँ ही ऐतवार न कीजिये...!
लगे हैं यंहा चेहरे पै चेहरे,हर किसी को गम-ख्वार न कीजिये...?

Wednesday, April 2, 2014


माना कि मंज़िले मुझसे दूर हैं दूर सही
रास्तों से कह दो अभी रुका नहीं हूँ में ..!

दुश्मनी का शौक हैं तो सब्र भी रखो,
अभी बक्त के थपेड़ों से टूटा नहीं हूँ में...!

राहे-मंज़िल में मेरी,खार बिछाने वालो,
फूल क्या.,काँटों से दोस्ती रखता हूँ में ...!

मेरी खामोशियाँ,अफ़साने बयां करती हैं
तरानों से हर दिलों में बसा करता हूँ में ...!

साथ चलता है मेरे दुआओं का काफिला
मुसीबतों से कह दो अभी डरा नहीं हूँ में....!

"संतोष"नाम है सब्र का,शुकून का तस्सली का
तभी तो ज़िंदगी के हर रंगों में रंगा हुआ हूँ में...!
सत्ता की चाह में
नेता नियंत्रण
खोते जा रहे हैं...!
फिसलती जुवान
से स्तरहीन
होते जा रहे हैं...!
शेर से चूहे,कुत्ते
बिल्ली तक
आ गये हैं...!
गालियों की क्या कहें...?
एक दूसरे को
नोचे खा रहे हैं...?
ये सत्ता रानी
न जाने किसका
वरण करेगी...?
"संतोष"ये नेता-गिरी
कब तक नैतिकता का
हरण करेगी...?
जबलपुर में
हर वर्ष बढ़ते हैं...!
राजनेतिक दल
दिखावे का
आंदोलन भी
करते हैं...?
पर दाम क्या कभी
आगे बढ़ने के बाद
पीछे हटते हैं...?
ये तो पार्टियां हैं
जो दामों में लगी
आग से अपनी
रोटियां सेंकते हैं...!
और ये दूध वाले
दूधिये बल्ब की
तरह चमकते हैं...!
गाय-भैसों का
चारा जब ये
नेता खा जायेंगे...!
फिर तो ये भूखे
ही रह जायेंगे...!
जानवरों का
निवाला
तो न छीने...!
"संतोष" बच्चों से
दूध का प्याला
तो न छीने...?
सरकारी नियंत्रण
अब सुस्त हो रहा है...!
तभी तो हर कोई
अब मस्त हो रहा है...?
मेहनशकश
मेहनत कर
मर रहा है...!
पूंजीपति
बिना मेहनत
अपनी जेब
भर रहा है...!
मज़दूर अपने
हक़ के लिए
लड़ रहा है...!
मालिक
खुलेआम
शोषण
कर रहा है...!
ये हमारी
आज़ादी का
दर्पण है...!
जंहा श्रमिकों का
सिर्फ तर्पण है...?
बेकारी,भूख
और गरीबी...!
आज़ाद भारत
में अभी भी...?
भारत माँ भी
अब अपनी
सरकारों से
परेशान है...!
क्यूँ कि "संतोष"
सरकारें मौलिक
मुद्दों से बनी
अनजान हैं...?

वैसे तो बारह महीने
हम एक दूसरे को
मुर्ख बना रहे है...?
फिर भी आज
1 अप्रैल को
हम मुर्ख दिवस
मना रहे हैं...?
मुर्ख दिवस मनाने
का अपना एक
अंदाज़ है ..!
यंहा तो हर कोई
मुर्ख बनाने में
सरताज है...?
चपरासी बाबू को
बाबू साहिब को
साहिब बड़े साहिब को
बड़े साहिब बॉस को
नेता जनता को
और जनता
अपने आप को
मुर्ख बना रही है ...!
तभी तो जनता
की लगाम इन
नेताओं के हाथ में
आ रही है...?
हमको जाति-धर्म
के नाम पर बाँट कर
ये वोट मांगते हैं ...?
भावनाओं को
भड़काना
ये बखूबी जानते हैं...?
आइये अब हम
इनको भी
मुर्ख बनायें ...!
अनेकता में एकता
और भाईचारे का
रंग इनको दिखाएँ ...!
हमें बाँटने वालों को
हम ऐसा छकाये....!
दुबारा हमारे घर
'संतोष" वोट मांगने
कभी न आयें....?

अद्वतीय,अनमोल,अतुल्य,
अविस्मरणीय है माँ
साक्षात् ममता की मूरत,
रमणी से भी रमणीय है माँ
अविनाशी,घट-घट वासी,
सब की संकट हारणी है माँ
भक्तों की सदा करती रक्षा,
छत्र,त्रिशूल धारिणी है माँ ...!
चरणो में जो भी माँ के आता ,
उसके लिए तो दयनीय है माँ ...!
कामना हमारी करती पूरी
हमारे लिए कमनीय है माँ ....!
अन्तर्वासी,अंतर्यामी,अभय दायनी,
बिन मांगे बर देती, बरदायनी है माँ
अंधेरों में तू राह दिखाती,भ्रम हटाती
भक्तों की कल्याण कारिणी है माँ ...!
"संतोष" पड़ा माँ शरण में तेरी
अब अपने अंक उठा ले माँ ....!
ये दुनिया मुझको रास न आवे
अब अपने दरश दिखा दे माँ....!

फूल खिलने के बाद बिखर जाते हैं ...!
पर कांटे अपना असर छोड़ जाते हैं...!

दौलत मिलने के बाद हम संवर जाते हैं ...?
पर सामने आते ही आइना बिफर जाते हैं ...!

बड़ी अजीब रश्मे है इस दुनिया की...!
मुश्किलें दौरां में हम ठहर जाते हैं ...?

झूठ में जीने की आदत हो गई है हमें
सच सामने आते ही हम सिहर जाते हैं ...!

बच्चों को इंसान बनाने की फ़िक्र में
हम खुद इंसानियत से दूर चले जाते हैं ....?

बंदे खुदा के बनके आये थे "संतोष'इस जंहा में
अपनी जरूरतों में खोकर हम बेखबर हो जाते हैं...!

कलियुग में फर्क नहीं है, साधू और शैतान का
बाबाओं ने नाम डुबाया, रहीम और राम का ...?

इंसानियत ही पहला धर्मं है इंसान का...
फिर पन्ना खुलता है गीता या कुरान का...

पर आदमी है यंहा राम का या रहमान का
भला तो वो पंक्षी है, जो है सारे जहान का ...?

दौलत की अंधी गली ही सबको प्यारी लागे
नेकी उनको रास न आवे,काम करें हैवान का...?

दी कुदरत ने है जब, एक सी नेमत हमको
प्रेम के ढाई आखर से,जीते दिल जहान का ...?

दिखाएँ दरिया दिली,मिटा दें गर में को हम अपने
बंदा खुद बन जायेगा खुदा,नाम होगा भगवान का ...!

जंहा में ज़िंदगी ज़मी की है "संतोष"दो पल की
फिर अनजान अनंत सफ़र है चिर आसमान का...!
" दुनिया से मिलने मे सब मस्त है "संतोष'
और खुद से मिलने की सारी लाइने व्यस्त है...!!! "
कैद कर दिया सापों को ये कहकर सपेरे ने "संतोष'
बस अब ईन्सानो को डसने के लिये ईन्सान काफी है "...
रंगो का ये त्यौहार
लाये खुशियां अपार
करे प्यार की बौछार
बजे दिलों में झंकार ...!
छाये रंगो का श्रृंगार ....!
गिरे नफरतों की दीवार
हर तरफ हो प्रेम की बहार ...!
अच्छाई की जय-जय कार ...!
"संतोष"आप को मुबारक हो
प्रीति का ये होली त्यौहार...!

नेताओ की होली ..
एक दूजे पर कीचड़ उछाल खेलें नेता जी होली ...!
गज़ब की इनकी भाषा है और गज़ब की बोली ...!

कुर्सी का रंग ही याद रहा बाकी रंग सब भूले...!
सत-रंगी दुनिया छोड़ चुनावी रंग में ही फूले...!

झूठे वादे-प्रेम दिखावे अब पहुँच रहे हैं घर घर...!
सत्ता की लालसा में,बिन खेले हो गए तर-तर ...!

महगाई के काले रंग में, अब फीकी होली होती..!
किसी ने नेता जी पर महगाई की कालिख पोती...?

कब तलक खेलेंगे ये, जन-भावनाओं की होली....!
सजगता से सोच के, भरना अब वोट की झोली...!

'संतोष' अब बाज़ार में ,नेताओं की किश्म बहुत हैं...!
दुष्कर हुई है परख, राजनीति में तिलिस्म बहुत हैं...?

होली की हुड दंग में,मन में ये कैसी उमंग ...!
डोर तोड़ वो उड़ गया,लो ऐसी जागी तरंग ...!

बिन पिए ही मदहोश हैं,सब बन रहे दबंग...!
मुन्नी को बदनाम करें,शीला हो गई तंग....!

शीला हो गई तंग, देवन लागी है गारी...!
बुरा न माने कोनो भाई, ये तो है हुरियारी...?

गुलाल-अबीर के भैया, अब दिन गए हैं बिसारी...
एक-दूजे पर कीचड़ फेकें, ऐसी गई मति मारी...?

बच्चे-बूढ़े समझ न आवें,पहचान न पावें नारी...!
ऐसे रंग में रंगे हर कोई,नाचत दुनिया सारी...!

राधा संग नाचे हैं मोहन,झूमत नर और नारी...!
हम बनें दुःख में सहभागी,ये परंपरा है हमारी...!

होली के त्यौहार पर, त्यागें द्वेष,दुश्मनी,और गँवारी ...!
"संतोष" सब मिलें प्रेम से, बनाये पर्व की गरिमा प्यारी...!
ज्यादा लालच इंसान को नेता बना देता है...!
बंगाल से दिल्ली में ला खड़ा कर देता है..
दूसरों के बल पर कभी राजनीती नहीं होती...!
अपनी क़ाबलियत औरों से छिपी नहीं होती...!
सोचा था साम्राज्य का विस्तार करेंगे ...?
अब अन्ना के भरोसे नैया पार करेंगे ...!
देल्ही की जनता को ममता से मोह नहीं है ...!
और ममता के मोह का कोई छोर नहीं है..!
राजनीती किस करवट बैठ जाये ...?
आज तक कोई न इसे समझ पाये ...?
"संतोष"वक़्त नूर को बेनूर बना देता है!
छोटे से जख्म को नासूर बना देता है!
अरे भाई माओ...!
दिल से दिल
मिलाओ ...?
जरा कुछ तो
संवेदना दिखाओ...!
अपने मलाल को
खुल के तो
बताओ....!
बहुत हो चुकी हिंसा
अब तो अमन के
रास्ते आओ...!
बातचीत से हर
समस्या का हल है...!
ये न भूलो
देखा किसने कल है...?
खूबसूरत प्रकृति की
छटा में यूँ न नफरत
बरसाओ...?
नैसर्गिक प्रेम की
धरा पर"संतोष" कुछ
तो प्यार फैलाओ..!
कोई मलाल में रहता है...!
कोई जलाल में रहता है...!

समस्याएं बढ़ी हैं इस कदर
हर शख्स जंजाल में रहता है ...!

उलझनो में उलझा हुआ है
गुम -सुम वो ख्याल में रहता है...!

फ़िक्र है उसे अपने आशियाने की,
तभी वो दुनियाई बबाल में रहता है...!

गरीब अब पेट की आग बुझाये कैसे
दौरे-महगाई में इस सवाल में रहता है...!

मज़दूर अपने जायज हक़ से बंचित है
तभी तो वो अब हड़ताल में रहता है...!

खुशियों को न जाने किसकी नज़र लगी...?
इसीलिए "संतोष" अब पड़ताल में रहता है ...?

दिल में उमंग ,मन में तरंग हो तो होती है होली ..!
अपनों का संग,हाथों में हो रंग तो होती है होली...!

रंग हो प्रीति का, या हो मीत का तो होती है होली...!
रंग हो हार का,या हो जीत का तो होती है होली...!

रंग हो विस्वास का, अपनों की आस का होती है होली..
रंग हो अहसास का, और पास-पास का होती है होली...!

रंग हो मस्ती का, प्रेम की बस्ती का, तो होती है होली...!
दंभों की धुलाई, दुश्मनी की सफाई हो तो होती है होली...?

रंग में न भंग हो, भंग भले ही संग हो तो होती है होली..!
भीगे हर अंग हों, हाथों में बहु-रंग हों तो होती है होली...!

अबीर-गुलाल पिचकारी अंखियन हरियारी हो होती है होली ...!
गांव की गौरी शहर की छोरी हैं सब मतवारी होती है होली...!

फाल्गुनी गीतों की बहार,रंगों की फुहार हो तो होती है होली ...!
"संतोष" डूबे जो उल्हास में, राधा कृष्ण के रास में होती है होली..!