Wednesday, April 2, 2014


नेताओ की होली ..
एक दूजे पर कीचड़ उछाल खेलें नेता जी होली ...!
गज़ब की इनकी भाषा है और गज़ब की बोली ...!

कुर्सी का रंग ही याद रहा बाकी रंग सब भूले...!
सत-रंगी दुनिया छोड़ चुनावी रंग में ही फूले...!

झूठे वादे-प्रेम दिखावे अब पहुँच रहे हैं घर घर...!
सत्ता की लालसा में,बिन खेले हो गए तर-तर ...!

महगाई के काले रंग में, अब फीकी होली होती..!
किसी ने नेता जी पर महगाई की कालिख पोती...?

कब तलक खेलेंगे ये, जन-भावनाओं की होली....!
सजगता से सोच के, भरना अब वोट की झोली...!

'संतोष' अब बाज़ार में ,नेताओं की किश्म बहुत हैं...!
दुष्कर हुई है परख, राजनीति में तिलिस्म बहुत हैं...?

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