Wednesday, April 2, 2014


माना कि मंज़िले मुझसे दूर हैं दूर सही
रास्तों से कह दो अभी रुका नहीं हूँ में ..!

दुश्मनी का शौक हैं तो सब्र भी रखो,
अभी बक्त के थपेड़ों से टूटा नहीं हूँ में...!

राहे-मंज़िल में मेरी,खार बिछाने वालो,
फूल क्या.,काँटों से दोस्ती रखता हूँ में ...!

मेरी खामोशियाँ,अफ़साने बयां करती हैं
तरानों से हर दिलों में बसा करता हूँ में ...!

साथ चलता है मेरे दुआओं का काफिला
मुसीबतों से कह दो अभी डरा नहीं हूँ में....!

"संतोष"नाम है सब्र का,शुकून का तस्सली का
तभी तो ज़िंदगी के हर रंगों में रंगा हुआ हूँ में...!

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