Saturday, May 10, 2014
आदमी का
गिरता स्तर
जल स्तर
से भी नीचे
जा रहा है....!
आँखों में अब
जल संकट
साफ नज़र
आ रहा है....
आँखों की नमी
कंही खो गई है...!
पथरानी आँखे
अब सो गई हैं...?
पानी की कमी
का असर
जज़बातों पर
दिखता है ..
ज़ज़्बात भी
हालात पर
बिकता है....?
कितने बादल
गरजे होंगे...?
कितने बादल
बरसे होंगे...?
आंधी- तूफां,
बिजली गगन में
जब चमकी होगी ...!
तब काली बदरी
मेघ बन बरसी होगी...!
यूँ ही आसानी से
पानी कभी न
मिल पाता है....!
बिन पानी ही
पानी का मोल
समझ आता है...!
पानी ब्यर्थ न
गंवाएं ..!
जल ही जीवन है
इसे बचाएं....!
अब तो जल के
ठाठ निराले
ए टी एम से
पानी निकाले,,,!
"संतोष" पानी
का मान
करें हम
बक्त आने पर
पानी का दान
करें हम ....!
गिरता स्तर
जल स्तर
से भी नीचे
जा रहा है....!
आँखों में अब
जल संकट
साफ नज़र
आ रहा है....
आँखों की नमी
कंही खो गई है...!
पथरानी आँखे
अब सो गई हैं...?
पानी की कमी
का असर
जज़बातों पर
दिखता है ..
ज़ज़्बात भी
हालात पर
बिकता है....?
कितने बादल
गरजे होंगे...?
कितने बादल
बरसे होंगे...?
आंधी- तूफां,
बिजली गगन में
जब चमकी होगी ...!
तब काली बदरी
मेघ बन बरसी होगी...!
यूँ ही आसानी से
पानी कभी न
मिल पाता है....!
बिन पानी ही
पानी का मोल
समझ आता है...!
पानी ब्यर्थ न
गंवाएं ..!
जल ही जीवन है
इसे बचाएं....!
अब तो जल के
ठाठ निराले
ए टी एम से
पानी निकाले,,,!
"संतोष" पानी
का मान
करें हम
बक्त आने पर
पानी का दान
करें हम ....!
इंसानी
संवेदना
न जाने कंहा
खोती जा रही है ...?
पर जानवरों में
मानवीय
संवेदना
आ रही है...?
क्या हम
जानवरों से
पीछे होते
जा रहे हैं....!
इंसान की छवि
खोते जा रहे हैं....?
बात बात पर
सिर्फ मुह
चलाते हैं ...
हासिल कुछ
नहीं कर पाते हैं.... ?
जानवर हाथ -पैर
चला मेहनत की
खाते हैं...!
हम मुफ़्त खाने की
लत लगाते हैं ....?
आदमी
आदमियत से
पीछे भागते हैं...
"संतोष"तभी तो
जानवर भी
आदमियत से
डर जाते हैं...!
संवेदना
न जाने कंहा
खोती जा रही है ...?
पर जानवरों में
मानवीय
संवेदना
आ रही है...?
क्या हम
जानवरों से
पीछे होते
जा रहे हैं....!
इंसान की छवि
खोते जा रहे हैं....?
बात बात पर
सिर्फ मुह
चलाते हैं ...
हासिल कुछ
नहीं कर पाते हैं.... ?
जानवर हाथ -पैर
चला मेहनत की
खाते हैं...!
हम मुफ़्त खाने की
लत लगाते हैं ....?
आदमी
आदमियत से
पीछे भागते हैं...
"संतोष"तभी तो
जानवर भी
आदमियत से
डर जाते हैं...!
बिना सोचे समझे
कुछ भी बोलते हैं....!
बोलने के पूर्व न
तोलते हैं.
बे-बजह अपना
मुह खोलते हैं....!
फिर अपनी
वाणी से मुह
मोड़ते हैं....?
ये आजकल
आम हो गया है...!
आदमी रंग
बदलने में
बदनाम हो गया है....!
रंग बदलने में
गिरगिट भी
अब लजाती है....!
आज के आदमी से
मात खाती है....?
अब तो योगी संत
सब झूठ के
सहारे खड़े हैं....?
"संतोष" तभी तो
वो हम आप से
बेहद बड़े हैं...?
कुछ भी बोलते हैं....!
बोलने के पूर्व न
तोलते हैं.
बे-बजह अपना
मुह खोलते हैं....!
फिर अपनी
वाणी से मुह
मोड़ते हैं....?
ये आजकल
आम हो गया है...!
आदमी रंग
बदलने में
बदनाम हो गया है....!
रंग बदलने में
गिरगिट भी
अब लजाती है....!
आज के आदमी से
मात खाती है....?
अब तो योगी संत
सब झूठ के
सहारे खड़े हैं....?
"संतोष" तभी तो
वो हम आप से
बेहद बड़े हैं...?
खतरों के खिलाडी
-----------------------
खतरों के
नाम पर
न जाने
क्या क्या
कराते हैं....!
कीड़े मकूड़े
मुह के ऊपर
डालते हुए
दिखाते हैं....!
हर नयी
कड़ी में नया
खतरा बढ़ाते हैं....!
दर्शकों को
इसी तरह
उलझाते हैं....!
अमानवीय खतरे
दिखाना क्या
लाज़िमी है....?
ये खतरों की अंधी
प्रतियोगिताएँ
आज भी हैं....!
"संतोष" पैसों की
खातिर न जाने
क्या क्या
कर जाते हैं....!
और खतरों के
खिलाडी
बन जाते हैं....!
-----------------------
खतरों के
नाम पर
न जाने
क्या क्या
कराते हैं....!
कीड़े मकूड़े
मुह के ऊपर
डालते हुए
दिखाते हैं....!
हर नयी
कड़ी में नया
खतरा बढ़ाते हैं....!
दर्शकों को
इसी तरह
उलझाते हैं....!
अमानवीय खतरे
दिखाना क्या
लाज़िमी है....?
ये खतरों की अंधी
प्रतियोगिताएँ
आज भी हैं....!
"संतोष" पैसों की
खातिर न जाने
क्या क्या
कर जाते हैं....!
और खतरों के
खिलाडी
बन जाते हैं....!
फेसबुक में चेहरे
मुखौटों की तरह
बदलते हैं....!
कुछ तो चेहरों
को देख
मचलते हैं....?
असली नकली
की पहचान यंहा
मुश्किल है ....!
यंहा सम्हालना
सिर्फ अपना
दिल है....!
जो नकली चेहरों
की गिरफ्त में
आ जाते हैं....!
फिर वो जीवन भर
पछिताते हैं...?
कुछ तो समय
बिताने आते है....!
कुछ मौज उड़ाने
आते हैं....!
कुछ तो इसके
शिकार हो जाते हैं....!
इसके चक्कर में
बेकार हो जाते हैं....!
फिर भी संवाद
सम्प्रेषण का
सुलभ साधन है....!
विचारों की
अभिब्यक्ति का
सुगम माध्यम है....!
यंहा सोच-समझ कर
दोस्ती करिये....!
अनजान चेहरों से
सम्हलिये.....!
नई जानकारी
नए नए रूप में
यंहा मिलती है....!
एक दूसरे के
माध्यम से तेजी से
फल-फूलती है....!
फेसबुक का सही
प्रयोग ज्ञान
वर्धक है.....!
"संतोष" अन्यथा
ये निर्थक है....?
मुखौटों की तरह
बदलते हैं....!
कुछ तो चेहरों
को देख
मचलते हैं....?
असली नकली
की पहचान यंहा
मुश्किल है ....!
यंहा सम्हालना
सिर्फ अपना
दिल है....!
जो नकली चेहरों
की गिरफ्त में
आ जाते हैं....!
फिर वो जीवन भर
पछिताते हैं...?
कुछ तो समय
बिताने आते है....!
कुछ मौज उड़ाने
आते हैं....!
कुछ तो इसके
शिकार हो जाते हैं....!
इसके चक्कर में
बेकार हो जाते हैं....!
फिर भी संवाद
सम्प्रेषण का
सुलभ साधन है....!
विचारों की
अभिब्यक्ति का
सुगम माध्यम है....!
यंहा सोच-समझ कर
दोस्ती करिये....!
अनजान चेहरों से
सम्हलिये.....!
नई जानकारी
नए नए रूप में
यंहा मिलती है....!
एक दूसरे के
माध्यम से तेजी से
फल-फूलती है....!
फेसबुक का सही
प्रयोग ज्ञान
वर्धक है.....!
"संतोष" अन्यथा
ये निर्थक है....?
सच जब भी सामने आता है
झूठ जब दबंगई दिखाता है .........बुरा लगता है....!
महफिलें रास नहीं आती हैं
तन्हाई जब पास बुलाती हैं .... ....बुरा लगता है.....!
झूठ जब दबंगई दिखाता है .........बुरा लगता है....!
महफिलें रास नहीं आती हैं
तन्हाई जब पास बुलाती हैं .... ....बुरा लगता है.....!
पहाड़ तले जब ऊंट आता है ..
अपनों का साथ छूट जाता है .......बुरा लगता है.....!
ग़मों की झड़ी लग जाती है ...
वफायें जब हमें ठग जाती हैं .......बुरा लगता है.....!
आईना जब सामने आता है.
फरेबी चेहरा सामने लाता है ......बुरा लगता है.....!
फ़र्ज़ जब निभाया जाता है ...
क़र्ज़ जब चुकाया जाता है ........ बुरा लगता है.....!
मेह्गाई के इस मौजूं दौर में
परिवार जब चलाया जाता है .... बुरा लगता है.....! .
अनैतिकता से कमाया जाता है
कालाधन जब छिपाया जाता है.... बुरा लगता है.....!
सत्ता जनहित जब नकारती है ...
"संतोष" माँ भारती कराहती है.... बुरा लगता है.....!
अपनों का साथ छूट जाता है .......बुरा लगता है.....!
ग़मों की झड़ी लग जाती है ...
वफायें जब हमें ठग जाती हैं .......बुरा लगता है.....!
आईना जब सामने आता है.
फरेबी चेहरा सामने लाता है ......बुरा लगता है.....!
फ़र्ज़ जब निभाया जाता है ...
क़र्ज़ जब चुकाया जाता है ........ बुरा लगता है.....!
मेह्गाई के इस मौजूं दौर में
परिवार जब चलाया जाता है .... बुरा लगता है.....! .
अनैतिकता से कमाया जाता है
कालाधन जब छिपाया जाता है.... बुरा लगता है.....!
सत्ता जनहित जब नकारती है ...
"संतोष" माँ भारती कराहती है.... बुरा लगता है.....!
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