Tuesday, January 28, 2014

ख़ुशी की तलाश में हम 
गम के करीब हो गए...!

ख़ुशी के रास्ते भी अब 
कितने अज़ीब हो गए ...!

झूठ की सवारी कर हम
अब खुशनसीब हो गए...?

कैसी हैं बक्त की मजबूरियां ...?
जो हबीब थे,वो रक़ीब हो गए....!

सच का सामना दो पल न कर सकें,
हम अब इतने, बद-नसीब हो गए ...!

ज़माने के साथ चलते चलते "संतोष"
झूठ-फरेब के कितने करीब हो गए ..?

No comments:

Post a Comment