ख़ुशी की तलाश में हम
गम के करीब हो गए...!
ख़ुशी के रास्ते भी अब
कितने अज़ीब हो गए ...!
झूठ की सवारी कर हम
अब खुशनसीब हो गए...?
कैसी हैं बक्त की मजबूरियां ...?
जो हबीब थे,वो रक़ीब हो गए....!
सच का सामना दो पल न कर सकें,
हम अब इतने, बद-नसीब हो गए ...!
ज़माने के साथ चलते चलते "संतोष"
झूठ-फरेब के कितने करीब हो गए ..?
गम के करीब हो गए...!
ख़ुशी के रास्ते भी अब
कितने अज़ीब हो गए ...!
झूठ की सवारी कर हम
अब खुशनसीब हो गए...?
कैसी हैं बक्त की मजबूरियां ...?
जो हबीब थे,वो रक़ीब हो गए....!
सच का सामना दो पल न कर सकें,
हम अब इतने, बद-नसीब हो गए ...!
ज़माने के साथ चलते चलते "संतोष"
झूठ-फरेब के कितने करीब हो गए ..?
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