ऋतू बसंत की
फ़िज़ां आ गयी है ...!
तन-मन पर
बासन्ती घटा
छा गयी है .
भोरों में अब भी
सनक वही है ...!
पर कलियों में वो
मेहक नहीं है
बाग-बगीचे
बौरा गए हैं ...!
गुलशन में अब
भौरां नए हैं...!
कोयल भी अब
मधुर गीत
है गाये ..!
पीली सरसों
अम्बर पर छाये...!
नव-उमंग
नव-तरंग
है लाया ....!
मन-मोहक
मधुर बसंत
है आया...!
तितलियाँ
इठलाके
नाच रही हैं...!
बच्चे-बूढ़े
सब के मन को
जाँच रही हैं...?
वीणा वादिनी
हम को ऐसे
स्वर दें ....!
जन-जन में
हम नवरंग
भर दें ....!
"संतोष" ऋतू
बसंत की मस्ती में
मदहोश हुआ है...!
फिर भी देखो
असंतोष हुआ है ...?
फ़िज़ां आ गयी है ...!
तन-मन पर
बासन्ती घटा
छा गयी है .
भोरों में अब भी
सनक वही है ...!
पर कलियों में वो
मेहक नहीं है
बाग-बगीचे
बौरा गए हैं ...!
गुलशन में अब
भौरां नए हैं...!
कोयल भी अब
मधुर गीत
है गाये ..!
पीली सरसों
अम्बर पर छाये...!
नव-उमंग
नव-तरंग
है लाया ....!
मन-मोहक
मधुर बसंत
है आया...!
तितलियाँ
इठलाके
नाच रही हैं...!
बच्चे-बूढ़े
सब के मन को
जाँच रही हैं...?
वीणा वादिनी
हम को ऐसे
स्वर दें ....!
जन-जन में
हम नवरंग
भर दें ....!
"संतोष" ऋतू
बसंत की मस्ती में
मदहोश हुआ है...!
फिर भी देखो
असंतोष हुआ है ...?
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