Wednesday, August 13, 2014












प्रतिकूलताएं 
अनुकूलताओं 
की जननी हैं ...!
बाकी सब अपनी 
ही करनी है ...?
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जानवर हैरान हैं 
बढ़ते देख अपना 
नया कुनवा ....!
आदमी की 
शक्ल में ये 
नए जानवर
हैं मनवा....?

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गम हो या ख़ुशी 
ये अश्क दोनों में 
अपना एक सा 
रूप दिखाते हैं....!
दोनों अवशरों में 
नमकीन अश्रु लिए
चले आते हैं....!

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वो जन-धन तन
को ही अपनी
हैसियत में
मापते थे ....!
क़ाबलियत
और विनम्रता को
कम आंकते थे ...?
बक्त ने जब
पलटा खाया
एक मुश्किल
दौर आया...!
जन-धन -तन
कुछ काम
न आया ....!
तब उन्हें
क़ाबलियत का
ख्याल आया ...!
अब वो ज्ञान पर
जोर देते हैं ...!
योग्यता के आगे
हाथ जोड़ लेते हैं ....!
गुमान का गुब्बारा
हवा में उड़ गया है ....!
"संतोष" अब
वो इंसानियत से
जुड़ गया है....!
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लोभ के झोंके.!
मोह के झोंके ...!
यश के झोंके....!
धन के झोंके 
तन के झोंके ....!
जन के झोंके
इन झोंकों में
मन को टोंके.
अहम को रोकें ....!

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